मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

स्त्री की अस्मिता और राजनीति (संदर्भ-मैत्रेयी पुष्पा की ‘फैसला’ कहानी)

         
21वीं सदी के दूसरे दशक में कदम रखने बावजूद स्त्री की दशा में ज्यादा फर्क(बेहतर) महसूस नहीं किया जा सकता.दिसंबर 2012 में दिल्ली में निर्भया बलात्कार का जघन्य काण्ड होया सन 2013 के सितंबर महीने में ही आसाराम बापूपर नाबालिक लड़की के साथ अमानवीय कर्म अर्थात बलात्कार का आरोप हो या इसी महीने में मुजफ्फरनगर में लड़की के साथ हुई छेड़छाड़ का धार्मिक-उन्माद में बदल जाना हो.ये सभी घटनाएं हमें नए सिरे से स्त्री के प्रति होने वाली घटनाओं के प्रति सोचने-समझने पर मजबूर करती है.तीनों घटनाओं के केन्द्र में लड़कियां ही है,जबकि इन तीनों घटनाओं को अलग-अलग संदर्भों में व्याख्यायित किया गया है.दिल्ली की घटना में फांसी की सजा को समाधान के रूप में प्रस्तुत करना तथा आसाराम को धर्म के झंड़ेबरदार के रूप में रेखांकित करना एंव मुजफ्फरनगर की घटना को सामंप्रदायिकता के रंग में रंग देने की रणनीति,हमें खबरदार करती है कि स्त्री-अस्मिता से जुड़ा मुद्दा किस तरह अलग-अलग रूपों में बदल दिया गया.स्त्री को महज अपनी राजनीति और आन-बान-शान से जोड़कर उसके मौलिक-अधिकारों की अनदेखी करने का षडयंत्र इन सभी घटनाओं में साफ झलकता है.स्त्री को मनुष्य के रूप देखने के बजाय उसे अपनी रणनीति के तहत महज वस्तु के रूप देखने का नजरिया उभर कर सामने आता है.इन सभी संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में ही स्त्री-अस्मिता के सवाल को बेहतर ढंग से समझा एंव विश्लेषित किया जा सकता है.
उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में जहां अस्मिता का प्रश्न अहम सवालों में से एक है,वहीं स्त्री-अस्मिता का प्रश्न एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभर कर सामने आता है.जिसे किसी भी कीमत पर अनदेखा नहीं किया जा सकता,क्योंकि यह आधी आबादी के अधिकारों का सवाल भी है.इन अधिकारों की शुरूआत समानता के बिना संभव नहीं है.इसलिए स्त्री की अस्मिता की चर्चा करना अर्थात् स्त्री के उन सभी अधिकारों की मांग जो उसे मनुष्य की अवधारणा के रूप में परिभाषित होने से वंचित रखते हैं.इसी स्त्री अस्मिता से आरंभ होकर स्त्री-आंदोलनों के माध्यम स्त्री के विभिन्न-पक्षों को अनेक माध्यमों के जरिए पुरजोर ढंग से उठाया जा रहा है.इस संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में ही स्त्री-विमर्श को भी समझा जा सकता है. स्त्री-विमर्श की तह में ही सबसे प्रमुख प्रश्न है...स्त्री को मनुष्य के रूप में स्वीकारा जाना. जबकि समाज में उसे दोयम दर्जे की प्राप्ति और साथ ही समाज की रूढ़ परंपराएँ जिन्होंने स्त्री को स्त्री के रूप में परिभाषित किया है.सीमोन द बॉउवर के शब्दों में कहे तो—स्त्री पैदा नहीं होती स्त्री बना दी जाती है,अर्थात इससे सवाल उठता है उस जेंडर और सेक्स का जिसमें सेक्स जैविक संरचना है,तो जेंडर सामाजिक कन्स्ट्रक्टर अर्थात् औरत की मौजूदा अधीनता,अपरिवर्तनीय जैविक असमानताओं से नहीं पैदा होती बल्कि यह ऐसे सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों और विचारधाराओं की देन है जो महिलाओं की वैचारिक और भौतिक अधीनता को सुनिश्चित करती है.इसलिए नारीवादी विचारक लिंग-भेद आधारित काम,यानी लिंग के आधार पर श्रम विभाजन और उसमें भी ज्यादा आधारभूत स्तर पर यौनिकता और प्रजनन के प्रश्न को एक ऐसे विशेष के रूप में देखती है जिसे जैविक संरचना जो प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय मानी जाती है के दायरे से बाहर रखकर देखना चाहिए.”1
 आधुनिक काल के  आरंभिक साहित्य में स्त्री की पहचान दिखाई देने लगी थी किंतु स्त्री की अस्मिता का केंद्र में आना बाकी था.अलग-अलग अस्मिताओं के सवाल परवर्ती पूंजीवाद की देन है.इन्हीं संदर्भों में धीरे-धीरे स्त्री का सार्वजनिक और राजनीतिक परिवेश बनना शुरू हुआ.स्त्री जीवन के अनछुए पहलुओं पर विचार-विमर्श होने लगा.स्त्री जीवन के संदर्भ और संबंधों को साहित्य नये सिरे से परिभाषित करने लगा.स्त्री-विमर्श ने समाज के तमाम वर्चस्ववादी नजरियों को चुनौती देना शुरू किया तथा उन स्थितियों पर भी प्रहार किया जो स्त्री को अस्तित्वहीन,अस्मिताहीन बनाते है.इससे एक नई परिवर्तनकारी सोच सामने आने लगी है. जिसने स्त्री की स्थिति एंव अवस्थिति को पहचानने एंव नई पहचान बनाने की प्ररेणा शक्ति प्रदान की है.इसी ने आधी दुनिया के अस्तित्व,उसकी अस्मिता,भविष्य एंव उसके सरोकार से जुड़े प्रश्नों को साहित्यिक स्तर पर भी पुरजोर ढंग से अभिव्यक्त करना शुरु किया.
स्त्रीवादी लेखिकाएं स्त्री-अस्मिता को एक नहीं कई रूपों में देखती है.किसी के यहां लिंग,किसी के यहां शरीर,किसी के यहां मन तो किसी के यहां स्त्री की अनुभूति प्रमुख है.स्त्री अस्मिता के स्वरूप को सुधा सिंह ने इस तरह परिभाषित किया है-स्त्री अस्मिता का प्रमुख आधार है,स्त्री को पुरूष संदर्भ से बाहर लाना और स्त्री संदर्भ में रख कर देखना.पितृसत्तामक विचारधारा का विरोध करना.उन तमाम तर्कों का निषेध अथवा अस्वीकार जो स्त्री को उसकी स्वतंत्र पहचान से वंचित करते है अथवा मातहत बनाते हैं.स्त्री और पुरूष दो अस्मिताएं है.2 दरअसल स्त्री अस्मिता का सवाल केवल व्यक्तिक अस्मिता का सवाल नहीं है,बल्कि व्यक्तिक अस्मिता के सामाजिक अस्मिता में रूपातंरण की प्रक्रिया है. जो सदियों से स्त्री के अनेक स्वरुप स्वयं गढ़ एंव निर्मित कर रहा है. स्त्री का स्वरूप  गढ़ने में कई आधारो ने मुख्य भूमिका निभाई है.जिस वजह से स्त्री की अनेक पहचान समाज में निर्मित हुईं,पर मनुष्य के रूप में उसे कभी नहीं पहचाना गया.इन्हीं तमाम बिंदुओं को स्त्रीवादी लेखिकाओं ने अपने –अपने ढंग से साहित्य में चित्रित किया है.
मैत्रेयी पुष्पा की फैसलानामक कहानी स्त्री अस्मिता और वर्तमान  राजनीति की परतों को खोलकर रख देती है.वसुमति गांव में प्रधान चुनी जाती है तो अपने ब्लॉक प्रमुख पति का रबड़ स्टांप है.पति उस पर दबाव डालकर उल्टे सीधे फैसले करवाता है.वसुमति भीतर ही भीतर आहत होती रहती है.पुरुष वर्चस्व के आत्मसातीकरण से उत्पन्न संकोच से भीतर ही भीतर ही लड़ती है.”3 इस कहानी में समाज में मौजूद स्त्री और पुरुष संबंधों के बीच की खाई को भी उजागर किया है तथा समाज की भूमिका को भी उभारा है..समाज केवल व्यक्तियों का समूह मात्र नहीं होता,बल्कि वह व्यक्ति के अस्तित्व की ऐसी शर्त बन जाता है जिससे पृथक व्यक्ति की कल्पना संभव नहीं है.व्यक्ति,परिवार और समाज के आपसी ताने-बाने को विश्लेषित और व्याख्यायित करने का कर्य साहित्यकारों ने मुख्य रुप से किया है. .परिवार समाज को व्यक्ति से जोड़ता है.परिवार में ही व्यक्ति के विभिन्न सामाजिक संबंधों की नींव है-- स्त्री और पुरुष.किसी समाज में स्त्री का स्थान क्या है,इससे उस समाज की स्थिति पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है.फैसला नामक कहानी में भी वसुमति की स्थिति उसके पति की तुलना में दोयम दर्जे की है तथा उसको मिलने वाले वोटों का कारण उसका स्त्री होना ही है.जो कि स्त्रियों का अपने स्व के प्रति सचेत होने तथा उसी के माध्यम से अपने सारे दुःख-दर्द दूर करने के सपने भी साथ में संजोए हुए है.इसी कारण वासुमति को इतने अधिक विरोध व पार्टीबाजी के बाद भी जीत हासिल हुई.वासुमति अपनी जीत का विश्लेषण करते हुए कहती है कि--
"कैसे मिल गए इतने वोट  ?
गांव में पार्टीबंदी थी,विरोध था,फिर...?
बाद में कारण समझ में आ गया था,जब मैंने सारी औरतों को एक ही भाव से आह्लादित देखा.उमंगों-तरंगों का भीतरी आलोड़न चेहरों पर छलक रहा था."4
वासुमति की जीत में गांव की सभी स्त्रियों को अपनी जीत या अपने अधिकारों के प्रति लड़ने की एक उम्मीद दिखाई दे रही थी.पर वासुमति को जीत में अपनी हार के पहलु भी नजर आ रहे थे.किस तरह सका पति पहले की तुलना में उस पर अधिक बंदिशे रखने लगा और उसकी जीत को अपनी प्रतिष्ठा के साथ जोड़ कर देखने लगा.पितृसत्ता की यह खासियत होती है कि वह स्त्री को अपनी आन-बान-शान से जोड़कर औरत पर बंदिशे बढ़ाता चलता है और खुद की हैसीयत को बढ़ाता चलता है--
 " वे प्रमुख बने तो बंदिशों में कुछ और कसावट आ गई और जब मैं स्वयं प्रधान बन गई तो उनकी प्रतिष्ठा कई-कई गुना ऊंचे चढ़ गई."5
वासुमति के पति प्रमुख बने तो उन्होंने उस पहले की तुलना में बंदिशों को ओर अधिक बढ़ा दिया.स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को लेकर सचेत मैत्रेयी ने वासुमति के माध्यम से स्त्री की स्थिति को रेखांकित किया है,कि किस तरह स्त्री पर बंदिशे और शान-शौकत के घटने-बढ़ने से जोड़ कर देखने की पुरुषवादी सोच स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकती.परंतु समाज में स्त्रियां धीरे-धीरे ही सही पर अपने अस्तित्व के प्रति सचेत भी हो रही है तथा उसके खिलाफ आवाज बी बुलंद कर रही है.अब चुपचाप सहने की की रिवायत में काफी बदलाव नजर आने लग गया है.इसी कहानी की पात्र ईसुरिया अपनी सोच को उजागर करती हुई कहती है--
ईसुरिया- "बरोबरी का जमाना आ गया.अब ठठरी बंधे मरद माराकुटी करें,गारी-गरौज दें,मायके न भेजे,पीहर से रुपइया पइसा मंगवावें,क्या कहते है कि दायजे के पीछे संतावें,तो बैन सूधी चली जाना बसुमती के ढिंग."6
ईसुरिया कहानी में दलित पात्र है.रमणिका गुप्ता कहती है कि- स्त्री मुक्ति की अवधारणा सापेक्षक है.ऐसे तो मुक्ति की अवधारणा भी बदलती रहती है लेकिन एक गरीब खटने-कमाने वाली औरत की मुक्ति उसकी देह-मुक्ति के साथ-साथ जो पुरुष हिंसा का शिकार बनती है-उसकी भूख से मुक्ति भी है,जिसके लिए रोजगार की जरूरत होती है.एक दलित मजदूर औरत के लिए तिहरी मुक्ति चाहिए-श्त्रीपन,गरीबी,और जाति की मुक्ति.इसी गरीबी रेखा के नीचे वाले वर्ग की स्त्री और निम्न मध्यम वर्ग,अभिजात व उच्च मध्यम वर्ग की स्त्री के लिए देह का अर्थ भिन्न होता है.”7
दरअसल स्त्री-मुक्ति का संघर्ष कई स्तरों पर एक साथ लड़ा जा रहा हैं.एक और वह राजनैतिक-आर्थिक दासता के विरूद्ध लड़ते हुए संपूर्ण समाज के सदस्य की हैसियत से संघर्ष में अपना योगदान था तो दूसरी ओर समाज के भीतर अपनी दीन-हीन दशा के विरूद्ध संघर्ष है.वासुमति की राजनैतिक भागीदारी महज उसके पति द्वारा छलावा मात्र थी.वह उसे घर की चार-दीवारी में ही बंद रखना चाहते थे.जब वासुमति पंचायत में चली जाती है तो उसका पति रनवीर घर आने पर उसे उसकी हैसीयत का पाठ पढ़ाने लगता है---
 लौटकर रनवीर ने खूब समझाया था,"पंचायती चबूतरे पर बैठती तुम शोभा देती हो ? लाज-लिहाज मत उतारो.कुल-परंपरा का ख्याल भी नहीं रहा तुम्हें ? औरत की गरिमा आढ़-मर्यादा से ही है.फिर तुम क्या जानो गांव में कैसे-कैसे धूर्त हैं ? "8

पुरुषवादी सोच स्त्री को अपनी मर्यादा से जोड़कर उसकी गुलामी या दासता को और अधिक मजबूत करना चाहती है.जगदीश्वर चतुर्वेदी कहते है कि—स्त्री की पहचान जन्मजात न होकर सामाजिक निर्मिति है.स्त्री की अस्मिता का निर्माण करने वाला प्रमुख तत्व है उसका पुरुष संदर्भ,इसके अतिरिक्त उसकी अस्मिता को पहचानने का यदि कोई रूप सामने आता है तो समाज आज भी इस रूप में स्त्री को पहचानने से इंकार करता है.”9
     वासुमति पंचायत में जाकर फैसला करने के बाद सुख और आनंद की अनुभूति करती है,क्योंकि उसे भी इस बात का हसास है कि सदियों जो रास्ता बंद पड़ा था उसके खुलने की शुरुआत इस फैसले से हो गई थी.यह फैसला स्त्री की चेतना को जागृत करके प्रेरित करने का रास्ता भी खोलता था.
"  फैसला करवाकर आयी तो अपूर्व तोष में भीगी हुई थी.अनाम आर्द्रता और प्रेमिल निष्ठा के साथ लिया  निर्णय.पवित्र मंदिर-सा लगा था पंचायत का चबूतरा,जिस पर बैठकर रुके हुए सड़े जल को जैसे काटकर बहा दिया हो मैंने.सम्पूर्ण गंदगी रिता दी हो अपने हाथों से.अब मानो नई वाटिका का बीजारोपण होगा वहां."10

"सुन ले, और समझ ले अपनी औकात, मजबूरी में खड़ी करनी पड़ी तू.मैं दो-दो पदवी नहीं रख सकता था एक सात.सोचा था पत्नी से अधिक भरोसोमंद कौन...."11 वासुमति का पति रनवीर उसे उसकी औकात बता कर अपनी सोच को उजागर करता है तथा समाज के एक बड़े सच को कहानीकार इस पात्र के माध्यम से उजागर करती है.औकात का अहसास करने के पीछे पुरुष समाज का अपनी सत्ता का छीन जाने का डर साफ झलकता है.एंद्रीना रीच ने इस पर अपने विचार रखते हुए कहा है कि-स्त्री संघर्ष  का समस्त इतिहास सदियों से चुप्पी में डूबा हुआ है.किसी भी स्त्रीवादी लेखिका के लिए सबसे बड़ी सांस्कृतिक बाधा यह आती है कि प्रत्येक स्त्रीवादी लेखन किसी शून्य से पैदा हुआ जान पड़ता है,जैसे कि हममें  से प्रत्येक बिना किसी ऐतिहासिक अतीत संदर्भ युक्त वर्तमान के जीते,सोचते और काम करते है.यह उन कई रास्तों में से एक है जिसमें स्त्री के काम को विच्छिन्न,अनियमित और अपनी किसी भी परंपरा से यतीम मान लिया जाता है.”12दरअसल यह वर्चस्ववादी राजनीति का एक अंग है,जिसके तहत स्त्री को बंदिशों में रखने की कवायद आज भी जारी है.ग्राम्शी ने वर्चस्व की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए माना है कि समाज में एक विशेष प्रकार की संस्कृति दूसरी प्रकार की संस्कृतियों पर हावी रहती है.यही स्थिति पितृसत्तामक समाज की भी है,जहां स्त्री की स्थिति अन्याकी है और पुरुष कर्त्ता के रूप में सामने आता है.ऐसी स्थितियों में एक और वह पितृसत्तामक समाज द्वारा उत्पीड़ित की जाती है तो दूसरी और बाहरी परिवेश यही समाज पूंजीवाद का मुखौटा पहन कर उसे निकटतम कोटि की उजरती गुलाम में तब्दील कर देता है.दरअसल पितृसत्ता केवल वैचारिक,मानसिक या सांस्कृतिक स्तर की अथवा सुपरस्ट्रक्चर की चीज नहीं बल्कि समाज के आधार से संबंधित चीज है,जिसका उत्पादन के साधनों उत्पादन के संबंधों और उत्पादन के तरीकों से बड़ा भौतिक संबंध है.”13
निर्णय लेने का अधिकार भी मूल रूप से स्त्री के पास नहीं है.अपने जीवन से जुड़े निर्णयों से लेकर राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक आदि सभी निर्णयों में स्त्री को स्वतंत्रता नहीं है.इस सभी निर्णयों में पुरुष का हस्तक्षेप या सीधे-सीधे उन्हीं का एकछत्र राज चलता रहा है.भले ही इसके दरकने के स्वर भी कहीं-कहीं से सुनने लगे हो,पर पूरी तरह से अभी टुटे नहीं है.वासुमति  को भी निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित किया उसके पति ने तथा रबड़ स्टाप की तरह अपनी को इस्तेमाल करने वाला उसका पति सभी निर्मय अपनी मर्जी से लेता था एंव वासुमति पर भी थोप देता था.इसी परिप्रेक्ष्य में ईसुरिया वासुमति को कहती है कि तुम ने भी हमारी सारी उम्मीदें तोड़ दी."ईसुरिया का शोकगीत थमा न था,"अच्छा होता बसुमति, हम अपना वोट काठ की लठिया को दे आते,निरजीव लकड़ी को.उठाये उठती तो.बैरी पर वार तो करती.अतीचालों के विरोध में पड़ती.पर रनवीर की दुल्हन ,तुम तो बड़े घर की बहू ही रहीं.पिरमुख जी की पत्नी.घूंघट में लिपटी पुतरिया-सी चलती रहीं,आंखें मूंद के."14 वासुमति केवल घुंघट में लिपटी काठ की गुड़िया के समान प्रतीत हो रही थी.क्योंकि उसकी परवरिश भी इसी पितृसत्तामक समाज में हुई थी,जो आरंभ से ही यह कंडीशनिंग करना शुरू कर देता है कि पति की हर इच्छा का पालन करना उसका परम धर्म है,उसी के परिणाम स्वरूप वासुमति भी अपने पति का विरोध नहीं कर पाती.वह हरदोई के पक्ष में अपने दिए गए फैसले पर अंत तक नहीं टिक पाती,क्योंकि उसके पति ने दूलरा ही फैसला कर दिया था.जो कि समाज की पुरुषवादी सोच के अनुरुप ही था.दूसरी तरफ हरदेई के पिता के रोदनमय बयानों पर पुलसिया कलम चल रही थी--" दहेज के लोभी पति से मार-पीट हुई थी,रात के समय.उसकी बिगड़ी हुई आदतों के चलते हम अपनी बेटी को नहीं भेजते थे उसके साथ.पर होनी को नहीं टाल पाये,दरोगा जी.पिरान खो दिये मेरी हरदेई ने.मां बेहोस पड़ी है घर में "15 राजनैतिक साजिशों के तहत हरदेई के पिता और वासुमति का पति हरदेई के पति के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज करा देता है.दहेज के खिलाफ बने कानून का अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए किस तरह मासूम लोगों को इसमें फंसा देते है.कहानीकार ने इस पहलू पर भी फोकस किया है कि किस तरह से एक वाजिब कानून को इंसानियत के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
   राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी को सुनिश्चित करने तथा,पुरुष-वर्चस्व व ,सांमती-सोच और पितृसत्तामक ढांचे में फंसी वासुमति एक दिन वह झटके के साथ संकोच की दीवार लांघ जाती है.वह प्रमुख के चुनाव में अपना मत पति के खिलाफ देती है और उसका पति एक वोट यानी वासुमति के वोट से ही हार जाता है.रोल मॉडल संकोच की सीमा लांघने वाला किलिंग इंस्टिंक्टपा लेने में सहायता करते हैं.आज की स्त्री राजनीति,खेल,विज्ञान,साहित्य और अन्य क्षेत्रों में अपने रोल मॉडल चुन लेती है.इन रोल मॉडलों से प्ररेणा पाकर न जाने समाज की कितनी लड़कियों के दिलो-दीमाग में सपनों को जागृत किया तथा उन्हें प्रेरित किया अपने अधिकारों और निर्णय लेने की क्षमता के प्रति.उन सभी में एक विश्वास जगाया.यह काम हमारे जनतंत्र ने चुपचाप किया है कि गुमसुम,चुपचाप,सहमी औरतें आज आत्मविश्वास के साथ संसद के दरवाजे पर खड़ी हो कर चीख रही है-हमरा हिस्सा दो ! हिन्दी साहित्य और खासकर हिन्दी कहानी आज उसी चीख को दर्ज कर रही है.



संदर्भ-ग्रंथ सूचि-
(1)सं.-साधना आर्य,निवेदिता मेनन,जिनी लोकनीता,नारीवादी राजनीति,हिन्दी माध्यम कार्यान्वय     निदेशालय,दिल्ली,पृ.40
(2) सुधा सिंह,ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ,ग्रंथशिल्पी प्रा.लि. दिल्ली,2008,पृ.12
(3) सं.-अरुण प्रकाश,कहानी-संग्रह,हमारा हिस्सा,,पेंगुइन बुक्स,दिल्ली,2005,पृ. भूमिका
(4)मैत्रेयी पुष्पा,फैसला, सं.-अरुण प्रकाश,कहानी-संग्रह,हमारा हिस्सा,,पेंगुइन बुक्स,दिल्ली,2005,पृ. 314
(5)वहीं,पृ.315
(6) वहीं,पृ.316
(7)उद्धृत,रमणिका गुप्ता,कथादेश,सितंबर 2008,पृ.93
(8) मैत्रेयी पुष्पा,फैसला, सं.-अरुण प्रकाश,कहानी-संग्रह,हमारा हिस्सा,,पेंगुइन बुक्स,दिल्ली,2005,पृ. 319
(9) जगदीश्वर चतुर्वेदी,स्त्रीवादी साहित्य विमर्श,ग्रंथशिल्पी प्रा. लि.,दिल्ली,पृ.7
(10) मैत्रेयी पुष्पा,फैसला, सं.-अरुण प्रकाश,कहानी-संग्रह,हमारा हिस्सा,,पेंगुइन बुक्स,दिल्ली,2005,पृ. 322
(11) वहीं,पृ.324
(12) उद्धृत,सुधा सिंह,ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ,ग्रंथशिल्पी प्रा. लि.,दिल्ली,2008,पृ.47
(13)उद्धृत,सं. रमेश,संज्ञा उपाध्याय,आज का स्त्री आंदोलन,शब्दसंधान प्रकाशन,दिल्ली,पृ.19
(14) मैत्रेयी पुष्पा,फैसला, सं.-अरुण प्रकाश,कहानी-संग्रह,हमारा हिस्सा,,पेंगुइन बुक्स,दिल्ली,2005,पृ. 327
(15) वहीं,पृ.327


          


राजेन्द्र यादव हिन्दी का सबसे विवादित ढांचा या संस्था है

                         
 कामदेव उर्फ राजेन्द्र यादव जी,

हंस के सम्पादक महोदय जी, आप हमेशा ही विवादों में रहना पसंद करते है.आपकी इन करतूतों के चलते कई बरस पहले ही मैं ने आपको पढ़ना छोड़ दिया था.अब मैं हंस पत्रिका भी नहीं पढ़ता.खरीदता तो बिल्कुल ही नहीं हूं.एकाध बार कहीं किसी मित्र के यहां पडी मिल गई तो एक सरसरी-सी नजर जरूर मार लेता हूं.हालांकि एक पाठक के नजरिए से यह उचित दृष्टिकोण भले ही ठीक न हो,पर क्या करता .आप इतना अधिक विवाद या बदनाम रहे है कि मन उठ-सा गया था आपको पढ़ने को लेकर.ऊपर से आप पर लगातार महिलाओं को लेकर जो तथाकथित हिन्दी-समाज में किवदंतियां लगातार सुनता रहा हूं,कभी किसी रूप में तो कभी किसी रूप में.जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही.कुछ तो आपको कामदेव तक कहते है,पर कहने वालों क्या ? कहने वाले तो पता नहीं क्या-क्या और किस-किस के बारे में कहते है.पर लगता है आप भी कुछ फरक नहीं पड़ता.इतनी मोटी चमड़ी निर्मित करने का माद्दा भी आप ही रखते है.असल में छपास भी एक मानसिक रोग ही है,लोगों से क्या-क्या न करा दे.आप भी इस मनोविज्ञान को भली भांति जान-समझ गए थे.तभी तो विरोध होता रहा और आप अपने करम में लगे रहे.कुछ छपते रहे और आप है कि छापते रहे.कई बार तो लगता है कि हिन्दी के कई न्यूज-चैनल तक आपसे प्रभावित हो कर ही हमेशा विवादों के सहारे ही आगे बढ़ते हुए फल-फुल रहे है.आज जब मैं ने गुगल बाबा के कलेजे में –राजेन्द्र यादव के विवाद,भरा तो उसने कई विवाद सामने लाकर पटक दिए.तो सोचा क्यूं न .आपके विवादों का एक पिटारा तैयार कर दिया जाए.दरअसल आप अयोध्या ढांचे की तरह हिन्दी के विवादित ढांचे के रूप में स्थापित हो गए है.
 वर्ग दो हैं, एक जिन्होंने ज्ञान को मोनोप्लाइज़ (monopolize) किया है और दूसरा वो कि जिनके पास भौतिक अनुभव हैं. ब्राह्मण और नॉन ब्राह्मण. अगर मैं नॉन ब्राह्मण में भी वर्गीकृत करता तो वो जातिवाद था. ब्राह्मणों के पास कई हज़ारों साल से ज्ञान कैद है जिसे उन्होंने किसी दूसरे के पास जाने नहीं दिया, उनके पास ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या था. वो अमूर्तन में विचरते रहे, इसीलिए उनके पास कविता है, क्योंकि कविता अमूर्तन का खेल है. (ब्राह्मणों को ज्ञान-पिशाच कहना चाहिए-सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव  से गीताश्री की बातचीत) 
 ब्राह्मणों को ज्ञान-पिशाच कहना चाहिए”.आपकी उक्ति में दम तो है,पर आप भी तो अपने आप में एक संस्थागत तरीके से पिशाच ही है.आप ने भी तो उसी ज्ञान और सत्ता के सहारे इतना भोग-विलास किया.अन्यथा साहित्यकार तो ओर भी है हिन्दी में.दरअसल आपने हंस पत्रिका के नाम पर भरपूर शोषण तो किया ही,इसके साथ-साथ बदनामी को खूब भूनाया.मैं ने तो जब पढ़ना-लिखना शुरू किया,मने हिन्दी साहित्य के पढन-लेखन में आया,तो आप को लेकर सुनी गई बातों ने मेरे बालमन(साहित्यिक-समझ के लिहाज से) पर इतना बुरा प्रभाव डाला की,तभी मैं ने एक निर्णय ले लिया था कि कभी अगर कुछ छपने की आंकाक्षा हुई तो कम से कम हंस पत्रिका में कभी कुछ नहीं भेजूंगा.भले ही हिन्दी जगत के लोग यही से साहित्यकार ,लेखक,आलोचक होने का प्रमाण पत्र लेते हो पर मैं ने यह निर्णय लिया और मैं आज तक इस निर्णय पर कायम हूं.बिना किसी संशय के.संशय की कोई गुजाइंश ही नहीं है.
आपके शुभ-चितंकों और दुश्मनों की भी लंबी कतार और लंबी परंपरा रही है.कई बार तो लगता है नई-कहानी के लेखकों को ध्यान में(विशेषतः) रखकर ही अज्ञेय ने आधुनिक मनुष्य को यौन-वर्जनाओं का पुंज कहा था.हंस पत्रिका की वैतरिणी के सहारे आपने भी लगता है,अपनी सारी यौन-वर्जनाएं को मोक्ष तक पहुंचा ही दिया होगा.या अब भी कोई कसर बाकी रहती है.गुगल बाबा ने ही आप के किसी हमदर्द का यह लेख पर सामने रख दिया.राजेन्द्र यादव से नफरत की जा सकती है। राजेन्द्र यादव से प्यार किया जा सकता है मगर राजेन्द्र यादव को नकारा नहीं जा सकता। लेखकों की तीन तीन पीढ़ियां अपने लेखन के लिये राजेन्द्र यादव की शाबाशी पाने के लिये लालसा लिये बड़ी हुई हैं। जब तक राजेन्द्र यादव फतवा ना जारी कर दें या हंस में कहानी प्रकाशित ना हो जाए तो कहानीकार अपने आप को मुख्यधारा का हिस्सा नहीं मान सकता। यानी हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा के दरवाजे की कुंजी राजेन्द्र यादव ही आपको थमा सकते हैं।इस कुंजीने ही आप को इतना अधिक मौका उपलब्ध कराया.गलती केवल आप की नहीं है,उनकी भी है,जो लगातार सब कुछ जानते हुए भी अपने स्वार्थों के चलते चुप रहे या विरोध भी किया तो केवल अपना उल्लू सीधा करने के लिए.खैर आप भी शुरू से ही अपने रास्ते पर डटे रहे . कमाल का धैर्य और आत्म-विश्वास आप में भी कूट-कूट कर भरा हुआ है. राजेन्द्र यादव को समय समय पर तरह तरह के विवाद खड़े करने का भी शौक है। जैसे उनका एक साक्षात्कार था 'होना, सोना एक खूबसूरत बला के साथ' प्रवासी साहित्य पर उनकी हिकारत भरी टिप्पणी, हनुमान जी पर उनका बयान, ब्राह्मणों को ज्ञान पिशाच कहना- यह सब उन्हें केन्द्र में बनाए रखता है। यानी कि राजेन्द्र यादव अच्छी तरह जानते हैं कि समाचारों की हेडलाइन में कैसे बना रहा जा सकता है।
“'पाखी' के जनवरी, २०११ अंक में प्रकाशित 'संवाद' में वे कहते हैं- 'सन्‌ सैंतालीस से पहले का या बीसवी सदी से पहले का जो साहित्य है, वह सब हमें छोड़ देना चाहिए क्योंकि उस जबान को जिसमें वह लिखा गया, कोई नहीं समझता।' साहित्य को लेकर यह एक अद्भुत सोच है। ब्रिटेन में अब शेक्सपीयर को पढ़ना अनिवार्य नहीं रह गया है। हिन्दी के वरिष्ठतम साहित्यकार की ऐसी मॉडर्न सोच उन्हें नामवर सिंह से अलग खड़ा करती है। नामवर जी आज भी किसी पुस्तक का विमोचन करने उसे बिना पढ़े चल देते हैं, जबकि राजेन्द्र यादव ऐसा कभी नहीं करते। वे नये से नये लेखकों के लेखन से भी परिचित हैं। कभी झूठी तारीपफ नहीं करते।““भाई असगर वजाहत ने उन्हें इस सदी का सबसे बड़ा महाखलनायक द्घोषित किया था। (खलनायक या करिश्मा : तेजेन्द्र शर्मा) 

दिल्ली में 84 वर्षीय कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव के घर जाकर उन्हें दो घंटे तक गाली देने का समाचार कुछ ब्लॉगों पर प्रकाशित हुआ। दिल्ली का लगभग सारा हिंदी समाज 11 दिसंबर की इस घटना से परिचित था पर कहीं से इसके विरोध में कोई आवाज नहीं उठी। अंतत: 22 दिसंबर को जो वक्तव्य प्रकाशित हुआ वह इस प्रकार था:विभिन्न माध्यमों से पता चला है कि पिछले दिनों हिंदी के वयोवृद्ध लेखक राजेंद्र यादव के साथ उनके घर जाकर अजित अंजुम नाम के व्यक्ति ने, जो टीवी का पत्रकार बतलाया जाता है, बदसलूकी और गाली-गलौज किया। यह अत्यंत शर्मनाक और खेद जनक घटना है। हो सकता है अजित अंजुम की राजेंद्र यादव से कुछ शिकायतें हों। हम उस मामले में कोई भी पक्ष नहीं ले रहे हैं। लेखक के रूप में हमारा मानना सिर्फ यह है कि जब विवाद लेखन को लेकर हो और दो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों के बीच हो तो उसे लोकतांत्रिक तरीके से हल किया जाना चाहिए। हम इस तरह के व्यवहार की भर्त्‍सना करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि अजित अंजुम अपने इस व्यवहार के लिए अफसोस प्रकट करेंगे।”- नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, आनंदस्वरूप वर्मा, मंगलेश डबराल, मैत्रेयी पुष्पा, पंकज बिष्ट, प्रेमपाल शर्मा, भारत भारद्वाज।"आपके पक्ष में इन सभी महानुभवों ने भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभाई.

इस व्यक्तित्व की यही रिद्धि-सिद्धि है कि महिला हो या पुरुष, नौजवान हो या वयोवृद्ध, सभी बेहद सहजता से इसके कृति क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं और इसके साथ अपना एक आत्मीय यान बना लेते हैं। अपनेपन की साधिकार अनुभूति से गुजरने वाले लोगों की जो विराट बुद्धिजीवी संख्या राजेन्द्र यादव से जुड़ी रहती है वह शायद ही किसी दूसरे लेखक के नसीब में हो। तिस पर आगरा परिवार के मेरे जैसे लोगों की भी कमी नहीं है जो जब चाहे तब पूरी ठसक के साथ उनके एकदम निजी क्षेत्र में जा धमकते हैं।
उनके लिखे, बोले या छापे हुए ने ही विवाद खड़े नहीं किये हैं, 'व्यक्ति' राजेन्द्र यादव ने भी विवाद खड़े किये हैं- ऐसे विवाद जो एक बड़ी लेखक-पाठक बिरादरी में कहीं चिंता के साथ तो कहीं चटखारे के साथ बतियाये गये हैं और जिन्हें लेकर बहुतों का मानना है कि ऐसा सब कोई दुष्ट-दुस्साहसी व्यक्ति ही कर सकता है। मगर दुष्टताएं या क्षुद्रताएं सापेक्ष तरह से ली जाएं तो किस उस जीव में नहीं होती जो औरत का जाया हो और जिसे इंसान कहा जाता हो। बात तो समूची दुष्टता के बावजूद वह होने की है जो राजेन्द्र यादव हैं, और जिनकी संगति-कुसंगति एक साथ कई-कई पीढ़ियों के बीच संवाद के सेतु निर्मित करती रहती है।
अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बावजूद, हमें स्वीकारना चाहिए, राजेन्द्र यादव एक व्यक्ति लोकतंत्र हैं। उनका व्यक्तित्व एक ऐसे लोकतांत्रिक परिवेश का सृजन करता है जिसमें एक नवोदित रचनाकार की भी उसी तरह आवाजाही हो सकती है जिस तरह किसी सिद्ध-वृद्ध रचनाकार की होती है। यहां आकर एक व्यक्ति राजेन्द्र यादव के साथ बैठकर दरूआ भी सकता है और उन्हें गरिया भी सकता है और तमाम लंतरानियों के बाद अपने एक बड़े बुद्धिजीवी होने के आत्मरती तमगे को अपने जेहन में टांगकर खुशी-खुशी वापस अपने खोल में लौट सकता है। इतनी जबर्दस्त सुविधा लेखक-पत्रकार-चिंतक-विचारक आदि बिरादरी को और कहां उपलब्ध है?”
लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। राजेन्द्र यादव ने जो एक विशेष क्षेत्र निर्मित किया है उसमें हिंदी भाषा-संस्कृति-विचार-साहित्य-समाज की वे बहसें खड़ी हो रही हैं जो तरक्की नाम की वर्तमान अंधी चौंधियाहट के चलते पड़े बौद्धिक-वैचारिक अकाल के बीच जरूरी खुराक का काम कर रही हैं। प्रिंट और टेली मीडिया के वे लेखक-पत्रकार-संपादक जो व्यावसायिकता के दुराग्रहों के चलते अपने-अपने घरों में बोल तक नहीं पाते, उन्हें राजेन्द्र यादव की मेज पर जुबान मिल जाती है। इतना सुकून भी कम नहीं होता। इस सुकून की खातिर हिंदी की विचार बिरादरी के लिए राजेन्द्र यादव का होना जरूरी है। उनके न होने की कल्पना एक डरावने शून्य में बदलने लगती है। वह जियें और सबको जिलाये रखें।
राजेन्द्र यादव बताते हैं उन्होंने लिखा था हनुमान रावण के दरबार का पहला आतंकवादी था, औरंगजेब के दरबार में शिवाजी पहला आतंकवादी था और अंग्रेजों के दराबर में भगत सिंह पहला आतंकवादी था. यह राजेन्द्र यादव का पूर्ण विचार है. इसमें आपत्तिजनक क्या है? रावण का दरबार हो तो हनुमान आतंकवादी ही होगा. औरंगजेब का दरबार हो तो शिवाजी को देवपुरुष कौन कहेगा और अंग्रेजों का दरबार हो तो भगत सिंह की हैसियत किसी आतंकवादी जैसी ही रही होगी. लेकिन क्या वास्तव में ये आतंकवादी थे? और अगर राजेन्द्र यादव का यह पूर्ण विचार है तो क्या ओसामा बिन लादेन भी हनुमान, शिवाजी और भगत सिंह के समानांतर खड़ा हो जाता है. शायद राजेन्द्र यादव विरोध के उस स्वर को आतंकवाद कह रहे थे जो साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ा होता है. लेकिन विवाद हो गया और बात दब गयी.हकीकत यही है कि "मूर्ख हिन्दुओं" की लंका में यह राजेन्द्र यादव पिछले पच्चीस साल से अपनी कलम से आग लगाने का काम कर रहा है, और उस राजेन्द्र यादव के चाहनेवालों को तब खुशी होती है जब मूर्ख हिन्दुओं की इस लंका से धुंआ उठता है.(हंस के हनुमान जी- By संजय तिवारी 30/07/2011 17:27:00) 
आज इस के लिखने का कारण यह है कि ज्योति कुमारी का प्रकरण,जो कि दबी जुबान में हिन्दी-जगत के अंदर के खानों में काफी समय से चर्चा में रहा था.आज वह खुले मंच पर  आ गया.क्योंकि आप ने अपने संपादकीय में(सुना है) माफी के साथ स्पष्टीकरण दिया है.इन सभी विवादों में हमेशा राजनीति रही है,इससे इन्कार नहीं किया जा सकता.पर आप ने हमेशा इस(सैक्स) छवि का लाभ ही उठाया है.अतः आप दोषी तो है ही.  फिर भी सोचा कम से कम एक बार लिख कर मैं भी भड़ास तो निकाल ही लूं.आपसे मुझे कोई व्यक्तिगत परेशानी नहीं है,पर आप ने प्रेमचंद के नाम पर और हंस-पत्रिका की जमीन पर अपनी सैक्स की खेती को फैलाया है.इसलिए आप मेरी नजर में अन्य घृणित व्यक्तियों की श्रेणी में आ जाते है.कामदेव का आप साक्षात रूप लेकर हिन्दी जगत में अनेक छपासों का उद्धार करने के लिए आए है. इसलिए कम से कम छपने वाले आपके ऋणी है.कुछ ऋण तो आपने समय रहते वसूल कर लिया.बाकी बचा-खुचा भी आप लेकर स्वर्ग जायेंगे.आपकी मनोकामना पूरी हो.


मां

मां,मैं बहुत जल्दी उदास हो जाता हूं,
उदास होने के साथ-साथ हताश भी हो जाता हूं,
मां,तुमने क्यों नहीं सिखाया अपनी तरह सब कुछ पी जाना,
पी कर भी कभी उदास और हताश नहीं होना.
मां,क्यों तुमने मुझे लडना सीखा दिया,हर गलत बात पर,
तुम खुद चुप खीचती रही हर एक बात पर,
तुम खुद सहती-सहमी रही हर लात पर,
मां,फिर भी तुम मुस्कुराती रही अपने हर हालात पर,
मुझे क्यों नहीं सिखाया हसंते रहना अपने हालात पर.

हम होंगे कामयाब-(राजीव सुमन और संजीव चंदन)


राजीव सुमन और संजीव चंदन को देखकर पता नहीं क्यों बहुत दिनों से "जाने भी दो यारो" फिल्म के दोनों पात्र बार-बार मन में कोंधने लग जाते हैं.जो संघर्ष,विरोध के साथ-साथ सच की लडाई लडते हुए भ्रष्ट-व्यवस्था की भेंट चढ जाते हैं,क्योंकि सत्ता में बैठे लोगों की घुसपैठ काफी गहरी और मजबूत होती है.जिसका इस्तेमाल करते हुए वह अपने खिलाफ चलने वाले हर मामले को मैनेज करना जानते है और करते भी है. क्या मैत्रेयी पुष्पा भी मैनेज हो गई है ? क्या वर्धा के अलावा भी विभूतिनारायण की पहुंच हिन्दी के हर विभाग में है,नहीं है तो क्यों नहीं राजीव सुमन को पीएच.डी में दाखिला मिला.क्यों वह केवल यहीं एक मात्र लडाई करने के लिए संघर्ष कर रहा है ? क्या हमारे केवल उसके साथ इस लडाई में साथ भर होने से मामला निपट जाता है ? राजीव सुमन की मनोस्थिति क्या होगी,इस पर किसी ने विचार किया है? बहुत बार राजीव अपने को अकेला भी महसूस करता होगा.कहां है,वो सभी लोकतांत्रिक विभाग जो उसे दाखिला देंगे या उसे सभी ने अयोग्य घोषित कर दिया है ? है कोई जो राजीव को ठोस जमीन मुहैया करा सके ताकि वह इस लडाई को और अधिक मजबूती के साथ लड सके.अन्यथा हम एक व्यवस्था के खिलाफ खडे होने वाले को केवल एक तमगे में तब्दील करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे है.वैसे ही हम व्यवस्था के खिलाफ खडे होने का साहस नहीं कर पाते(इतने मुखर रूप में)अगर यहीं परिणीति रहीं तो ये दोनों मात्र नारों में तब्दील होने के अलावा कुछ नहीं रहेंगे.क्या हम इतनी ही इमानदारी से इनके साथ है,जितनी इनकी उम्मीदें है,मुझे तो बिल्कुल उलट लगता है.

मैत्रीय पुष्पा को पाठक का खुला पत्र (पाखी-प्रकरण)


छिनाल-प्रकरण से लेकर ताजे विवाद,जो कि पाखी के मंच पर आपकी उपस्थिति को लेकर खडा हुआ है.जिस के संबंध में आपने अपना स्पष्टीकरण दिया तथा विरोध भी दर्ज किया है.एक पाठक होने के नाते मैंने आपका वह वक्तव्य ध्यान से पढा.पढने पर कुछ शंकाएं और अनकही बाते अनायास ही उभरने लगी.सोचा आपसे ही सांझा करना ज्यादा सही होगा.पहले बात करता हूं आपके कहे कि,जो आपने कहा-"मैंने पाखी पत्रिका के टॉक ऑन टेवल कार्यक्रम में जो भाग लिया अपनी समझ से लिया ,किसी के दबाब में नहीं।और बात चीत के दरमियान पाया कि विभूति साहब अपने द्वारा मांगी गयी मांफी पर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। मुझे हंसी आगई।लेकिन जो भी है यह तो मानना पड़ेगा कि उस विवाद में वे आनंद नहीं ले पाए और तब के बाद किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं हुई कि स्त्रियों के लिए उन शब्दों का प्रयोग करे जिन पर हम आपत्ति जता रहे थे।रही बात जुलाई की पाखी में छपे साक्षात्कार में मेरी उपस्थिति की भर्त्सना की , तो समझ लीजिये कि इन बातों को सुनने और अपनी राह चलते जाने की मुझे आदत है।आपको बता दूं कि मैं बचपन से ही निडर रही हूँ।इस लिए ही यहाँ भी नहीं डरती। न विभूति न . राय से ,न राजेन्द्र यादव से और न उन लोगों से जो मेरे पाखी प्रकरण को लेकर आग बबूला होरहे हैं। मुझे किसी से न पद लेना ,न प्रमोशन।न पुरस्कार ,न पहचान का लालच है।आप बेशक अपने बीच से मुझे ख़ारिज कर दें क्योंकि मैं जैसी हूँ तो हूँ और मैं ऐसी ही हूँ , जिसका चीजों को तोड़ने से ज्यादा बदलने में विश्वास है। खिसियाकर वे मुझ पर हजार प्रहार करें और करेंगे ही , मैं जानती थी क्योंकि हम अपने मकसद में कामयाब हुए हैं।मेरी तस्वीर आपको अश्लील लग रही है मगर मेरा मकसद अश्लील हरगिज न था और न है।"
आप ने कार्यक्रम में भाग लेने का फैसला अपनी समझ से लिया,क्या यह समझ व्यक्तिक थी या इसके भी कई आयाम है.दूसरा "विभूति साहब"-शब्द के इस्तेमाल के पीछे की विचार-प्रक्रिया समझ से बाहर की है, क्योंकि इतना मनोविज्ञान तो समझ आता ही है कि विरोधी विचार के बजाय विरोधी व्यवहार और बयानबाजी करने वाले के लिए साहब शब्द मुंह से निकलेगा ही नहीं.उसके लिए खासकर जो सत्ता में बैठकर स्त्री को महज वस्तु की तरह ट्रीट करता हो.आपके कहे में साफ झलकता है कि कोतवाल "साहब"(?) अपने कहे पर शर्मिंदा बिल्कुल नहीं थे,नहीं तो वे यूं अपनी पीठ नहीं थपथपा रहे होते.हां यह जरुर है कि उस विरोध के बाद किसी में यह हिम्मत नहीं होगी कि खुले मंच से स्त्री के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करे.यह उस आंदोलन की जीत कही जाएगी,पर समय के साथ-साथ क्या विरोध अपनी धार खोता चला जाता है.अगर नहीं, तो आपका यूं बचकाना जवाब देना,हमारे होसले को परस्त कर देने में अहम भूमिका निभा सकता है.व्यक्ति का अपना निर्णय भी होता है,पर जब आप आंदोलन को लीड कर रहे होते हो तो आप का पर्सनल कुछ नहीं रहता.आपकी बातों में प्रतिक्रिया के साथ गुस्सा भी झलकता है,जो कि अपनी जगह वाजिब है.क्योंकि जिम्मेदारी एकतरफा नहीं होती.आप का पक्ष जाने बगैर हमारा यूं तिलमिला जाना आपको भी अखरा होगा.
पर कुछ प्रतिरोध क्षणिक भी होते है,जो आपसी संवाद से सुलझ भी जाते है.यह मामला संवाद-हीनता की स्थिति में पहुंचना हम सब की हताशा-कमजोरपन को भी दरशाता है.तोडने वाली बात पर भी एक बात कहने का मन है कि तोडने वाले तो विश्वास तोड कर भी ढोल पीटते है,उम्मीद है आपने विश्वास नहीं तोडा होगा.बने बनाएं ढांचे भले ही तोडे हो.बाकी आप ही के शब्दों में -‘स्त्रील की सच्चाेई से पुरुषवर्चस्व डरता है' अगर में यह बात कहती हूँ तो ऐसा ही लगेगा जैसे कह रही हूँ कि राजा-प्रजा से डरता है। यह बात झूठ भी नहीं। ( रचनाकार: मैत्रेयी पुष्पा का आलेख ‘स्त्रीह का पहचान पत्र' )http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_21.html#ixzz2YjgbnxrR)
उम्मीद है आपने भी पुरुषवर्चस्व वाले कोतवाल साहब(?) के अंदर डर पैदा किया होगा.
आप के अनुसार--- "कि साहित्य जगत में ईमानदारी से लिखने के लिए हिम्मत और हौसला चाहिए..क्योंकि सच लिखना ख़तरे से खाली नहीं है..समाचार चैनल न्यूज एक्सप्रेस के मंथन कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने बेबाक अंदाज में कहा कि साहित्य जगत में भी सियासत हावी है..मसलन किस पुस्तक को पुरस्कार मिलना चाहिए ..साहित्य कैसा लिखा जाए..किस लेखक को साहित्यकार माना जाए और किसको नहीं..ये सब साहित्य संसार में फैली राजनीति से तय होता है।उन्होंने समाज और साहित्य की राजनीति का सबसे बड़ा शिकार महिलाओं को बताया और कहा कि जिस प्रकार महिला को घर से लेकर पूरे समाज में पुरुष के बताये रास्ते पर चलना पड़ता है उसी तरह साहित्य में भी पुरुष लेखक खुद को साहित्य का सबसे बड़ा झंडाबरदार समझते हैं। वो कहती हैं कि साहित्य में महिलाओं का चरित्र किस तरह दर्शाया जाए, साहित्य के सिपहसलारों ने इसके भी नियम-कायदे तय किए हुए हैं। साहित्य संसार में महिलाओं की हालत दलितों जैसी है। साहित्य जगत में सक्रिय जो लोग तरक्कीपसंद होने का दम भरते हैं दरअसल व्यवहार में वो वैसे होते नहीं हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने लोकाचार जैसी परंपराओं को भी महिलाओं के खिलाफ साजिश करार देते हुए कहा कि इन लोकाचारों के जरिए महिलाओं को घरों की चहारदीवारी के अंदर कैद रखने की राजनीति की जाती रही है।(समाचार मीडिया.कॉम)"
उम्मीद करता हूं कि लोकाचार के खिलाफ आप की बुलंद आवाज, फिर से इन मठाधिशों की नींद भी उडा देगी.इस जगत में ईमानदारी से बोलने के लिए हिम्मत और हौसला चाहिए,जिसकी हम आप से निरंतर उम्मीद करते रहे है,रहेंगे भी.कोई गलती हो गई हो तो पाठक की प्रतिक्रिया समझ कर दरकिनार कर दीजिएगा.

आपका पाठक
नवीन रमन

सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

सुनील दत्त की एक कविता

आज मैं रेल में बैठा हूं,
बार-बार उसकी सींटी बजती है,
तुम्हे मेरी आवाज सुनाई ना दे,
उसमें मेरा क्या कसूर है ?
अरे मक्का-मदीना जाते है  कुछ लोग,
वहां से मिटा दी गई क्रांति,
और लगा दी गई दीवार,
क्योंकि हम उन मोहम्मद को दीवार में चुनते थे,
पर करे क्या वहाबियों ने कितनी मोटी दीवार लगा दी,
हमारा कसूर क्या हैं ?
कसूर है,
सुनते है हम,
अच्छों को भी और बुरों को भी,
पर ,
इतना ना चल पाता हमको पता,
दागदार है ज्यादा, अपने थोड़े-से,
जिनको हमने नेतृत्व दिया,
वहीं पाएं अपराधी,
अब, हे दुनिया वालों,
आपस में बात करो,
हम-तुम एक नहीं है साथी.
हा,हा,हा,हा,हा,हा,
होह,होह,होह,होह,होह,
ये एक प्रेत बोल रहा है,
बस!,बस !,बस.!

नेता भी चाहिएँ और नागरिक भी-प्रवक्ता पुरुषोत्तम अग्रवाल,भाग-1


 ( रेस्पेक्ट इंडिया द्वारा आयोजित 'श्री रामधारी सिंह दिनकर स्मृति व्याख्यान  3 अक्टूबर 2013 को हुआ । ' व्याख्यान पूर्ववत प्रसिद्ध आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल {पूर्व सदस्य ,यू.पी.एस.सी.} ने दिया । विषय है - ' नेता भी चाहिय़े और नागरिक भी '
कार्यक्रम मे श्री बी पी सिंह {पूर्व राज्यपाल ,सिक्किम } प्रो डी पी त्रिपाठी {सांसद ,राज्य सभा } एवं श्री मनोज तिवारी {लोकप्रिय गायक और अभिनेता } की गरिमामयी उपस्थिति रही ।तिथि - 03.10.2013 स्थान - मल्टी परपस हॉल ,इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ,मैक्स मुलर मार्ग ,न्यू दिल्ली ,समय : शाम 5 : 30 बजे )                        
                         
मैं एक ऐसे विषय पर बोल रहा हूं,जिससे हम सबका संबंध हैं.हम सब नागरिकों का संबंध हैं.मैंने जैसा आपको कहा कि दिनकर को देखने का अवसर मुझे नहीं मिला,लेकिन एक डाक्यूमैंट्री  बचपन में देखी थी,जिसमें वह(दिनकर) कविता पढ़ते हुए दिखते है-तान-तान फन व्याल के,मैं तुझ पर बांसुरी बजाऊं. तब मेरे बाल मन में यह इच्छा प्रकट हुई थी कि काश ! मैं कभी दिनकर को यूं सामने से कविता पढ़ते हुए देखूं.दिनकर कविता केवल पढ़ नहीं रहे थे.दिनकर पूरी अपनी मुख मुद्रा से,पूरी भंगिमा से,पूरे शरीर विन्यास से कविता को रच रहे थे जैसे,अद्भुत था वो कविता पाठ.दिनकर का एक निबंध जो 9वीं कक्षा में लगा हुआ था.उस निबंध का एक वाक्य मुझे किसी न किसी रूप में प्रभावित करता रहा है.वाक्य इस रूप में है कि-सब नेता बन जाएगें जब, जवाहर लाल कि मोटर कौन चलाएगा,नाश्ता कौन बनाएगा.,इस रूप में वो वाक्य मुझे हांट करता रहा है और इस निबंध का शीर्षक था-नेता नहीं,नागरिक चाहिए.उस निबंध को ही ध्यान में रखते हुए यह आज का शीर्षक-नेता भी चाहिएँ और नागरिक भी ,विषय चुना.

दिनकर ने वह निबंध 1951 या 52 में लिखा था और उसके वो तीन-चार वाक्य आपके सामने पढ़ना चाहता हूं.और फिर हम देखें कि 1951-52 से आज 2013 तक हम कहां पहुंच गए है और दिनकर जी के साथ वरिष्ठ कवि गुप्त जी कि यह पंक्ति याद करें कि-हम क्या थे,क्या हो गए और क्या होंगे.”  इसे विचारने का समय 1912 में भी था और इसे विचारने का समय 2013 में भी है.दिनकर के वाक्य पढ़ता हूं-कल्पना कीजिए,कि देश का एक-एक आदमी जवाहरलाल हो गया ,तब एक-एक आदमी सोचेगा,योजनाएं बनाएगा,बहस करेगा,लेकिन जब इन 35 करोड जवाहरलालों को भोजन कौन बनाएगा,उनके लिए कपड़े कौन धोएगा,मुश्किल यह है कि उनकी मोटरें कौन चलाएगा.जवाहरलाल बनने में और सब ठीक है,कठिनाई सिर्फ इतनी है कि जवाहरलाल कुदाल नहीं चला सकता,हथोडे नहीं उठा सकता और ज्यादातर वह अपनी मोटर भी आप नहीं चलाता है और इसलिए उस निबंध के अंत में उन्होंने लिखा कि दरअसल पूरा निबंध इस बात की वेदना में भरा हुआ है कि इस समय देश में नेता बहुत अधिक है.यह सन् 1951 की बात है.इस देश में हर आदमी नेता बनना चाहता है,नेता दिखना चाहता है.जाहिर है कि इस समय नेता का जैसा अवमूल्यन नहीं हुआ था,लेकिन अब हो चुका है.अब मौहल्ले के सबसे बदमाश व्यक्ति को,कॉलेज के सबसे दुष्ट छात्र को आजकल नेता जी कहते है.संभवतः यह स्थिति 1951-52 में नहीं थी.इसीलिए दिनकर जी ऑब्जरव कर रहे थे अपने आस-पास कि सभी नेता बनने के लिए उत्सुक है और उस निबंध में अंत में वह कहते है—और नेता होता कौन है ? अक्सर वह मनुष्य जो अपने मूल्यों को चरित्र व व्यक्तित्व को व्यवाहरिक रूप देता है.जिन मूल्यों की समाज को जरूरत होती है.नेता वो है,जो समाज के लिए जरूरी उन मूल्यों को अपने आचरण में उतारे और ऐसे नेता तभी उत्पन्न हो सकते हैं,जब कि हम सब बतौर नागरिक के ऐसे मूल्यों को अपने आचरण में उतारें.इसलिए दिनकर जी उस निबंध में स्थापित करते है कि-हमें नेता नहीं,नागरिक चाहिए.


यह बहुत महत्वपूर्ण है मित्रों,कि यह बात एक लेखक,एक कवि,एक साहित्यकार कह रहा हैं.देश का निर्माण आंरभ ही हुआ था.सारे समाज में उत्साह और आशावाद का वातावरण था.जवाहरलाल के नेतृत्व में लोगों कि अगाध आस्था थीं,लेकिन दिनकर जी यह नोट कर रहे थे कि कहीं कुछ गड़बड़ है.कहीं नागरिकता के निर्माण की,नागरिकता की सकंल्पना की समस्याएं उत्पन्न हो रही है.यह बहुत महत्वपूर्ण है.इसी समय हम यह भी याद करे कि एक और कवि ने बरसों बाद यह नोट किया था कि – अंततः हम एक आलोचनात्मक राष्ट्र का निर्माण करने में असफल रहे हैं.यह अज्ञेय का वाक्य है.2013 में यह बात सत्य लगती है कि हम एक आलोचनात्मक,एक उल्लेखवान,एक चिंतित राष्ट्र का निर्माण करने में दूर तक असफल रहे है और भावनाएं इस समय कितनी कोमल है.यही वो कारण है कि हर साल मैं केवल एक वक्तव्य करता हूं और करना चाहता हूं.क्योंकि मैं नहीं जानता कब आप में से कौन, कौन से मेरे वाक्य से आपकी भावना आहत हो जाए और कल कौन आप में से अपनी उस आहत भावना के लिए मेरे शरीर को शत-विक्षत और आहत करने के लिए उत्सुक हो.किसी को कुछ नहीं कह सकते.कब किसकी भावना ,किस  चीज से आहत हो जाए.किसी फिल्म में किसी गाने से,किसी कहानी से,किसी शब्द से,किसी कविता से,किसी के पात्रो के नाम से,कुछ नहीं कहा जा सकता है.भावनाओं की हमारा समाज इतनी चिंता करता है कि मैंने आज तक पिछले कुछ दिनों में किसी को यह शिकायत करते नहीं सुना कि फंला आदमी की फंला बात से मेरा विवेक आहत हो गया.आपने सुना हो तो कृपया मुझे बताएं ?


और यह उस सभ्यता में,कभी-कभी गर्व होता है इनचीजों को याद करते हुए,तो कभी उसी अनुपात मे लज्जा भी आती है कि उस सभ्यता में जब वेद में यह कथा आती है कि-जब देवता चले गए धरती छोड़ कर और एक-एक करके सभी बुजुर्ग और ऋषि भी मरने लगे तो देवताओं से पूछा गया कि धरती के नरों ने कि अब जब आप चले ही गए हो तो ऋषि भी अब धीरे-धीरे जा रहे है.हमारा नया ऋषि कौन होगा ? ऋषि यानि देखने वाला.हमारे लिए रास्ता कौन देखेगा ? और कौन दिखाएगा ? तो  उत्तर देता है कि देवताओं और ऋषियों के जाने के बाद तुम्हारा मार्गदर्शक तप होगा.यह आज से ढाई हजार साल पहले की बात है.उस समाज में,उस परंपरा में स्थिति यह कहती है कि तप और विवेक रचनात्मक अभिव्यक्ति कब किस तरफ से खतरे में आ जाए.इसकी कोई भविष्यवाणी नहीं है.मैं तो क्या ,कोई प्रोफेशनल अस्ट्रालाजर भी इस बारे में नहीं बता सकता .बड़े से बड़े ज्योतिषी से जाकर पूछ लीजिए जो यह बताने में सक्ष्म हो कि अगले प्रधानमंत्री श्री अलां होंगे या फंला होंगे.वह यह नहीं बता सकेगा कि किस बात से कब किसकी भावना आहत हो जाए.


इस कदर भावुक समाज की रचना हम लोगों ने की है और इसलिए अज्ञेय जी का यह कथन-अंततः हम आलोचनात्मक राष्ट्र के निर्माण में असफल रहे है.दिनकर की यह वेदना की नेता बहुत है लेकिन नागरिक नहीं है.इसीलिए मित्रों,इस स्थिति पर पूरी गहराई,पूरी गंभीरता के साथ विचार करना जरूरी है.आज की स्थिति मुझे याद दिलाती है एक किताब की.Revolution of Nihilism-warning to the west(1939)-author-Rausching Herman.ये अगस्त 1939 में लिखी गई थी.तारीख पर ध्यान दीजिए.यह इसीलिए कह रहा हूं कि अगस्त1939 में यह किताब छपी थी और इसका लेखक नासी पार्टी का भूतपूर्व सदस्य था.1937 तक नासी पार्टी में था और अगस्त 1939 में उसने यह किताब प्रकाशित की थी.और सितंबर 1939 में हिटलर ने हमला कर दिया था.Nihilism-विनाशवाद,हर तरफ विखंडन का दौर.किसी चीज में कोई आस्था नहीं.किसी संस्था,किसी मर्यादा और किसी परंपरा की कोई परवाह नहीं.जो हम कह रहे है,वही सही है.यह है Nihilism का तात्पर्य.यह पुस्तक आंरभ होती है अद्भुत वाक्य से आंरभ होती है- "हमारे समय में लालच है,इस बात का ,कि हम असहनीय को भी नाकाबिले बर्दाशत को भी बर्दाशत कर ले."


हालत कहीं और बदतर न हो जाए.सवाल यह है कि नाकाबिले बर्दाशत को बेहतर या बदतर में कौन-सी चीजें बदल सकती है.क्या करे ?

लेकिन इस सवाल का जवाब देने से पहले एक बहुत ही नाजुक सवाल से टकराना होगा कि  अगर चीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया तो अंततः हालात किस तरह के होंगे ? अगर आप कुछ न करे,तो यह तो सही है ही कि जो अपने को तटस्थ कहते है,समय उनका अपराध लिखेगा.हमारे कवि हमें बहुत पहले चेतावनी दे गए है.लेकिन वो अपराध लिखा जाएगा या न लिखा जाए.लेकिन हालात जिस तरह के है,उनको अगर उनके हाल पर छोड़ दिया जाए तो,वे किस तरफ जाएंगे.ये चेतावनी लेखक  जर्मनी को,सारे यूरोप को दे रहा था.ये चेतावनी जितनी 1939 में थी,उससे कम सार्थक 2013 में नहीं है.केवल भारत के लिए नहीं,बल्कि सारी दुनिया के लिए जिस तरह की स्थितियां बन रही है.जिस तरह की चीजें हो रही है.अगर वो अपने आंतरिक तट से जैसी की तैसी चलती रही तो हम कहां पहुचेंगे,इस पर सोचना चाहिए.
(जारी है.....

राख तले जतन से रखी आग


                           

पाखीपत्रिका के संपादक  प्रेम भारद्वाज हाल-फिलहाल के दिनों में  विवादों और लोकतांत्रिक निर्णयों के लिए काफी चर्चा में रहे.पत्रकारिता और सामाजिक-वैचारिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका के साथ रचनात्मक लेखन में भी निरंतर सक्रिय रहे है.  प्रेम भारद्वाज का कहानी संग्रह-इंतजार पांचवें सपने का सामयिक बुक्स प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.इस संग्रह में छोटी-बड़ी कुल बारह कहानियां हैं-शहर की मौत,जड़ें,फौंटेसी,क्या वह पागल था ?,बथान,दंगे में फूल,अपराध बोध,धंधा,मोहभंग,...लेकिन आसमान चुप है,बीच का रास्ता,इंतजार पांचवें सपने का .
शहर की मौत कहानी डाक्युमैंट्री शैली में शहर की मौत का विवरण प्रस्तुत करती है,जो खेल के मैदान से लेकर चाची की दुकान तक पसरा पड़ा है.जहां संवेदनाएं निरतंर कुचली जा रही है.फैंटेसीकहानी प्रेम की सहजता को महत्व देती है.क्षेत्रीयता  के नाम पर होने वाली हिंसा और राजनीति पर करारा प्रहार करती हुई कहानी क्या वह पागल था ?” दलित लखिया का प्रेम-प्रसंग और नक्सली-समस्या के महीन रेसों में बुनी बथानकहानी अपने शिल्प और संवेदना दोनों ही स्तरों पर इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है.दंगे में फूल सांप्रदायिक दंगों में बिछड़े बच्चे की कहानी है,जो पुलसिया-तंत्र की संवेदनहीनता के साथ-साथ दंगाइयों की अमानवीयता को शहर के कालिख-चेहरे के साथ उजागर करती है.अर्थी का धंधा करने वाला इंसान किस तरह अपनी मानवीयता खोकर मौत की प्रार्थना करता हुआ अपनी पत्नी की मौत पर सहजता से व्यवहार करता है.धंधा कहानी धंधे के अमानवीय पक्ष को प्रस्तुत करती है.नसरीन जिससे प्रेम करती थी,वह भी सांप्रदायिक निकला.इसी लिए वह उससे मिले बिना ही उसे छोड़ कर चली गई.बाबरी मस्जिद गिरने की खुशी प्रेमी के चेहरे पर देख कर नसरीन के भीतर की प्रेम-इमारत भी ढ़ह गई.लेकिन आसमान चुप है धार्मिक-उन्माद के अंदरूनी चेहरे को उजागर करती है.आलोक धन्वा की कविताओं से सराबोर कहानी इंतजार पांचवें सपने का सोम दा के क्रांतिकारी जीवन और उसकी गुमशुदगी के बीच  की विभिन्न प्रक्रियाओं का विश्लेषण करते है और स्वार्थ से भरे लोगों की पड़ताल करते हुए सपनों के मारे जाने की चिंता व्यक्त करते है.
अखबारों के पन्नों के बीच दबी हुई खबरें,टी.वी.की चिल्लाहट के बीच दब चुकी आवाजें,अगर कहीं बची हुई है तो, वह है साहित्यिक-संसार. जहां पर उन सभी खौलते-बोलते सवालों को,संवेदनाओं को,अंतर्विरोधों को,अपने समय की पीड़ाओं को और उज्ज्वल भविष्य की कामनाओं को जीवंत रूप में बचाएं हुए है.यह प्रयास है चीजों को बेतरतीब होने की यथास्थिति से बाहर निकालने का.गुमशुदगी के विज्ञापन में बदलते समाज के पलायन,मोहभंग,मेंटल-सेटलमेंट,हत्या-आत्महत्या,नक्सली वारदातें,साम्प्रदायिकता जैसे सवालों को अनेक सिरों से पारिभाषित करने की बजाय उनके कारणों-प्रभावों की पड़ताल करता हुआ, सन्नाटे के बीच मूकदर्शक बनने की प्रक्रिया के खिलाफ चहल-कदमी है.
तेज रफ्तार भरी जिंदगी के बीच लेखक इन तमाम सवालों को इनके संदर्भों के साथ छोटे-छोटे ब्यौरे के रूप में पाठक के सामने ताजगी के साथ रखता है.पाठक अपने आस-पास की जिदंगी में पसरे इन तमाम अनुभवों को गाहे-बेगाहे महसूस किए बिना नहीं रह सकता.महसूस करने के साथ-साथ अनदेखी के आलम से बाहर निकाल कर अपने परिवेश के प्रति जागरूक करने का अथक प्रयास इन कहानियों की ऊर्जा है.आम आदमी किस तरह तमाम-तंत्रों की रणनीतियों का शिकार बन रहा है,उसके जन-जीवन को कैसे तबाह-तबदील किया जा रहा है,इसकी पड़ताल गहरे सरोकारों के साथ लेखक ने अपने लेखन के जरिये की है.विकास के मॉडल को गहराई की जगह खाई में बदल देने के परिणाम फुटनोट की तरह जगह-जगह दर्ज हुए है,जो हाशिए पर धकेल दिए गए समाज की पीड़ाओं को संजीदगी के साथ टटोलने की जिम्मेदारी का अहसास कराते है.
ये कहानियां पाठक को मोहजाल में फंसाती नहीं बल्कि सामाजिक-प्रक्रियाओं में धीरे-धीरे शामिल करते हुए जागरूक-नागरिक के रूप में सचेत करती है तथा अपनी जिम्मेदारी एंव भूमिका के प्रति सोचने पर भी मजबूर करती है.यहीं से लेखन की शक्ति अपनी सार्थकता सिद्द करती है.चमक-दमक के दौर में जहां चमड़ी-दमड़ी का पाठ हर तरफ सीखाया जा रहा हैं,उसी  का प्रतिवाद बिना किसी शंखनाद के "इंतजार पांचवे सपने का" कहानी-संकलन करता है.आईस-पाईस के खेल की सहजता और अपना-पन इन कहानियों की बनावट में मौजूद है,जो एकल होते समाज की संरचना में एक गंभीर दस्तक की तरह है.ये दस्तक समाज की जड़ों में सामाजिकता की तलाश तो है ही,अपने बालकपन के खेलों को समाज से बाहर कर देने की पीड़ा का भी दस्तावेज है.टी.वी. भले ही भावुकता को बाजार में तबदील कर रहा हो,पर इन कहानियों में भावुकता सामाजिक सरोकारों के साथ मिलकर दादी-नानी की कहानियों की याद ताजा करती है.
   कहानियों के लिए पाठक न ग्राहक है,न कहानी केवल सौदा है. अगर वहां मौजूद है तो सिर्फ रिश्ता.इस रिश्तों को जोड़ती-मजबूत बनाती चाची की चाय की गरमाहट आप के साथ हमेशा मौजूद रहेगी.इस गरमाहट में ही पेड़-पौधे,घास,गंगा,नदी-नाले,मैदान,खेत-खलियान,गली-मुहल्ले,गांव-शहर आदि के बदलते समीकरणों को पहचाना जा सकता है.अतिवाद से लैस विचारों के बीच लेखक की मुख्य चिंता यही है कि-क्या सचमुच बीच का कोई रास्ता नहीं होता. संस्मरण और सचेत नागरिक की भूमिका के लिबास में पत्रकारिता को संजोए हुए 'इंतजार पांचवे सपने का' कहानी-संकलन अपनी सहजता में गंभीर मुद्दों को समेटे हुए है. ये कहानियां सनसनी को जन्म नहीं देती,बल्कि सनसनी और सन्नाटे के मौजूदा दौर में राख तले जतन से रखी गई आग की तरह है.
(यह लेख 29 सितंबर 2013 के प्रभात खबर में छपा है)