मंगलवार, 5 जनवरी 2016

मेट्रो और सेल्फ़ी

मेट्रो में फोटो लेना मना है पर सेल्फ़ी पर कोई रोक नहीं है ।क्योंकि सेल्फ़ी एक रोग है ।और रोग पर इस देश में किसी प्रकार की रोक नहीं है। भले कहावत रोक-टोक वाली हो ।एकाध कमीना मेट्रो में टोक भी देता है । टोकता भी नहीं है सही से तो । बस ऊँगली करता है ।गलत दिशा में सुई मत घुमाइए ।ऊँगली का मतलब है हाथ की ऊँगली से कन्धे को छूते हुए लिखे हुए की तरफ इशारा करता है। यह उस इशारे से बिल्कुल अलग है जो हम भरी भीड़ में अपनी प्रेमिका को करते है या उस छिछोरे के इशारे से भी अलग है जो आँख से करता है।

#टाइम_फोड़ना

घणा केजरीवाल ना बणै

#घणा_केजरीवाल_ना_बणै
बस सुबह की कम ठण्ड होने का फायदा उठाते हुए सरपट दौड़ती हुई नजफगढ़ की तरफ बढ़ रही थी। मस्त मौला टाइप ड्राइवर ने हरियाणवी गाने बजाए हुए थे। कम भीड़ थी ।लगभग सभी सीटों पर बैठे थे । कुछ खड़े भी थे पर सीट खाली थी ।हो सकता है एकाध स्टैंड बाद उन्हें उतरना हो ।अपनी फिदरत अनुसार मैंने बैठते हुए आस पास नजर दौड़ाई और लग गया अपने एकमात्र काम पर । जी बिल्कुल सही पहचाना आपने । फेसबुक । कुछ-कुछ टाइप कर ही रहा था । आँखे स्क्रीन पर थी। स्क्रीन नहीं की पैड पर। नजफगढ़ स्टैंड आया और ड्राइवर ने गाड़ी रोकी नहीं ।एक सवारी ने रोकने को कहा लगभग चिल्लाते हुए और नियम कानून गिनाते हुए। इतनी बकबक ड्राइवर से कहा सहन होनी थी जब तो बिल्कुल नहीं जब उसे सवारी दुबली पतली दिख रही ।
फड़फड़ाता जवाब देते हुए ड्राइवर ने कहा-बैनचोद घणा केजरीवाल ना बणै । जिसनै देखै केजरीवाल बणा हांडै। नास कर दिया दिल्ली का ।

हरियाणवी गालियां

#गालियां_भी_समझनी_पड़ती_है

गालियां गाम के जीवन का अहम हिस्सा होती है और सहज अभियक्ति का भी । एक किस्सा अचानक से याद आ गया तो सोचा अभी शेयर कर दूँ । बाद में हो सकता है फ़िसलकर कहीं गहरे चला गया तो पता नहीं कब बाहर निकल पायेगा ।

हुआ यूँ अक मैं और मेरा भाई गली में क्रिकेट खेल रहे थे ।हमारी दो पड़ोसन आपस में झगड़ने लगी । दोनों एक दूसरे को गन्दी-गन्दी गालियां देने लगी ।हम दोनों भाइयों को शुरू में तो खूब मजा आया । गालियों से ज्यादा इस बात पर आ रहा था कि उन दोनों के परिवार से हमारी नहीं बनती थी । गाम में नहीं बनने का मतलब यह होता है कि उनसे खूब झगड़ा हुआ है ।

गालियों के बीच एक ने अजीब गाली दी जो हमारे पल्ले ही नहीं पड़ी । उसने कहा भाई रोई रण्डी तू तो पैसेंजर रेल हो री । हम दोनों भाई एक दूसरे की तरफ देखते हुए समझने की कोशिश करने लगे कि इसका क्या मतलब है ? आज वो बात कैसे अचानक से याद आई यह भी गहरी जिज्ञासा बन गयी मेरे लिए ।

यह भी एक सीरीज ही है ।जिसमें आपको गाम की लड़ाई और उनके साहित्यिक प्रयोग आपसे साझा करूँगा ।

शब्दकोश

#शब्दकोश_चालू

यह शब्द भी कई शब्दों की तरह उलझन में डालता है। शब्द के साथ के केवल उसका अर्थ नहीं चलता ।बल्कि उसके ग्रहण करने की प्रक्रिया में पूरा परिवेश भी घसीटता हुआ कभी खड़ा तो कभी पड़ता हुआ साथ चलता है। एकेडमिक भाषा में कहे तो उसमें उस परिवेश के संस्कार,उस परिवेश का मनोविज्ञान तथा समाजविज्ञान साथ गुँथा होता है।

ऐसा ही यह शब्द है चालू। जो मुझ जैसों को यह सेक्स से जुड़ा अर्थ देता है। कहने का मतलब ये कि जो लड़का या लड़की किसी से सेक्स सम्बन्ध बनाता है बिना शादी के वो चालू है । पर अब इसका इस्तेमाल चालाक इंसान के लिए बहुतायत में होने लगा है । सेक्स वाला अर्थ कमजोर पड़ता जा रहा है। जो कि सही भी है ।यौन सम्बंधों को लेकर जड़ नैतिकता खत्म ही होनी चाहिए।

समालखा 2

समालखा 2

समालखा पर लिखना अभी शुरू ही किया है । सब ठीक-ठाक रहा तो साल भर तो लिख ही सकता हूँ इस विषय पर । कल अपनी बात को मैंने मोटा-मोटी ढंग से बताने की कोशिश की थी कि भूगोल के नजरिये से और अपनी बसावट में दरअसल समालखा है क्या ।

दोस्तों ने पोस्ट में खूब उत्साह वर्धन किया है और तीन टिप्पणी सबसे महत्वपूर्ण थी । पहली टिप्पणी यह थी कि समालखा में अब एक नहीं तीन मस्जिद है ।
दूसरी टिप्पणी नीरज वत्स ने की । जिसमें कहावत में वृद्धि करते हुए एक और कहावत बताई-

समालखा की तो दो ही चीज मसहूर सै

बानिये और बांदर .....

तीसरी टिप्पणी आर टी आई एक्टिविस्ट पी पी कपूर ने की ।उन्होंने ने पोस्ट को जातिवादी बताते हुए अपनी आपत्ति और विरोध दर्ज़ किया। जो कि सही भी है ।जातिवाद पर इसी तरह सवाल उठने चाहिए। पर मेरा मानना है कि समाज की जातिगत सरंचना और जातियों के बीच जो प्रेम और घृणा लगातार अप डाउन होती रहती है उस पर लिखना या बात करना जातिवाद किस तरह है ?

आपकी नज़र में जातिवाद क्या है ?

क्या आपको लगता है कि समाज में जातिवाद है ?

किस वजह से समाज में जातिवाद है ?

पुलिस और मामा

#पुलिस_मतलब_मामा

पुलिस वालों के लिए सबसे पॉपुलर गाली है मामा । जी बिल्कुल सही शंका है आपकी । मामा गाली कैसे हो सकती है ? ठुल्ले से भी ज्यादा यही चलती गाम के कल्चर में । जो पुलिस में भर्ती भी हो जाते है वो भी पहले इसी शब्द का इस्तेमाल करते हुए मंजिल तक पहुंचते है।

इस पूरी मानसिकता के पीछे है स्त्री का भाई होना । वो स्त्री जो किसी के साथ ब्याही गयी है। बहन को लेकर भावुक भले ही होते हो पर दूसरे की बहन और उसके भाई के प्रति तुच्छता दर्शाती मानसिकता उस स्त्री को तो कमतर मानती ही है साथ में उसके भाई को भी ।

वैसे तो साले को लेकर एक कहावत भी है-

और सारी असनाइ एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ।
असनाइ मतलब रिश्तेदार

इस तरह के अंतर्विरोध आपको हम सब में मिलेंगे । उन पर बात होनी चाहिए और आलोचना भी ।

मेट्रो की मशीन और तगाजगीर

मेट्रो की मशीन और तगाजगीर

मेट्रो स्टेसन में घुसने से पहले जो चैकिंग होती है उसी समय मशीन में सामान भी चैक होता है । सुबह और शाम के समय तो उसमें सामान डालने की इतनी मारा-मारी होती है कि कुछ दो छः बिलांग से ही बैग फेंक कर मारते है । उनकी फुर्ती और जज़्बे को देखकर ही यह शब्द दिमाग में अंकुरित हुआ-तगाजगीर ।

गाम के परिवेश से जिंदगी के अनुभव का ज़खीरा लिए घूमता हूँ तो पहला विचार मन में यह आया कि इन लोगों से गंडासे (चारा काटने की मशीन) में कुछ काटने को कह दिया जाये तो हो सकता है ये अपना हाथ भी कटवा लें । इतनी हड़बड़ी यह भी दर्शाती है कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है । यह गड़बड़ कोई आम-सी गड़बड़ नहीं है । इस पर अध्ययन होना चाहिए । कौन करेगा यह भी एक तरह का प्रश्न ही है । किसी को यह फालतू का काम लग सकता है । अब तो लगने लगा है फालतू काम ही असली काम है और असली काम के नाम पर बस धोखा हो रहा है। शोध करना जब मजबूरी और विवशता हो तो घण्टा शोध होगा । मैं खुद इस तरह के घण्टा काम करके उक्ता गया हूँ । कुछ मन का करना चाहता हूँ । सोचता रहता हूँ। करता मैं भी कुछ नहीं । सफलता-असफलता के फेर में लगता है मैं भी उलझने लगा हूँ ।

सफलता-असफलता तो लगी ही रहती है ।

दिल्ली मेट्रो

#अतिशयोक्ति

मेट्रों में इतनी भीड़ है कि दूर खड़े बुजुर्ग से मैंने कुछ ऑक्सीजन उधार ली और उस युवा ने उस आक्सीजन का तीन चौथाई हिस्सा खुद गड़प लिया । जो मुझ तक पहुंचाने का जरिया बन रहा था और आप कहते है दिल्ली में भ्रष्टाचार में कमी आई है। मेरी नज़रों ने तुरन्त एक लोकपाल खड़ा कर दिया । बगल में खड़ी लड़की ने जेब से रामदास को निकालकर मेरी जेब में डाल दिया।

कुछ लोगों के पैर जोर-जोर से जिंदाबाद के नारे लगाने लगे । वृद्ध वाली सीट की तरफ नजर गयी तो देखा उधर असहिष्णुता बैठी थी । शांति आई और उसने उसकी जगह लेते हुए शुक्रिया बिल्कुल नहीं कहा । धर्म और जाति दोनों ने आपस में हाथ टकराते हुए जीत का जश्न मनाया । उनके हाथ जब अपनी जेब की तरफ वापिस लौट रहे थे तो पास खड़े नास्तिक के नाक से टकरा गए । वह लहूलुहान होकर रुमाल निकालने की कोशिश करने ही लगा था कि एक दो जनों ने उतरने की हड़बड़ी मचा दी ।उनकी हड़बड़ी में सब गोलमोल हो गया ।

रविवार, 3 जनवरी 2016

माँ और गर्दन का मस्सा

गर्दन पर मस्सा

मेरी गर्दन पर छोटा-सा मस्सा हो गया है । जिस पर हाथ जाये बगैर नहीं रहता। जब हाथ जाता है तो मम्मी याद आने लगती है ।जो अब इस दुनिया से चली गयी है । अपनी खट्टी,मीठी और कड़वी यादों को हम सब के सिरहाने छोड़कर । याद आने का कारण है उनकी गर्दन पर छोटे मस्से का होना । यह मस्सा पहले नहीं था । अब अचानक से यह निकल आया है । यह मम्मी की याद दिलाकर आँखों में आंसू निकाल देता है । मिस यू मम्मी ।

आप भी सोचते होंगे कि बिल्कुल ही खलहर(बिहारी दोस्तों का शब्द) है क्या ? जो छोटी-छोटी बातें भी लिखने बैठ जाता है। लिखना लत हो गयी है अब। बगैर लिखे रहा ही नहीं जाता । पढ़े बगैर फिर भी काम चल जाता है पर लिखे बगैर कोई दिन हो ऐसा सोचा भी नहीं जाता। जब तक फेसबुक है तब तक आप को तुरन्त लिखा हुआ दिखता रहेगा फिर आपको पढ़ने के लिए सर्च करना पडूंगा । अगर आपका मन होगा मेरा लिखा पढ़ने का ।

पढ़ने-लिखने से दरअसल मैं खुद को गढ़ रहा होता हूँ ताकि जिंदगी को लिख सकूँ ।

परिवार

बचपन की यादें
शायद 1995

हल्की चैक की कमीज में मैं और पापा तथा छोटा भाई Amit Raman

सन् याद नहीं किसी रक्षा बन्धन का है । मेरे चेहरे से शर्मीलापन आपको भी टपकता दिखेगा और छोटे भाई के चेहरे से आत्मविश्वास । पापा अपने सहज अंदाज में ही खड़े है और फोटो खिंचवाते वक्त उनका जोर थोड़ा टेढ़े खड़े होने पर ही रहता है ।उनके अनुसार इस तरह फोटो बढ़िया आता है । छोटा भाई पापा के पदचिह्नों पर चलते हुए उसी अंदाज में खड़ा है ।मैं बचपन से थोड़ा विद्रोही और अलग चलने वाला रहा हूँ । 😜

बाकी सबके देखने का अपना नजरिया है ही।

समालखा-1

#समालखा

दिल्ली से 70 km और कुरुक्षेत्र से भी करीब इतना ही । यह मेरा नटखट गांव है जिसे अब कस्बा कहा जाने लगा है। रेलवे लाइन और जीटी रोड दो समानांतर आवागमन के बीचोबीच में है समालखा । पर अब धीरे-धीरे इसने अपना विस्तार चारों तरफ कर लिया है।

जाति के आधार पर कहे तो समालखा जाट बहुल क्षेत्र है । और आस-पास के गांव में जाट और गुज्जर दोनों की बहुलता है। समालखा के जाटों बाबत कहावत चलती है कि -समालखा के जाट, जै बै तोलो घाटे घाट। मतलब ये की समालखा के जाट को जितनी बार परखो गे वो उतनी बार दगा देगा। यह आम धारणा है। सच और झूठ का मिश्रण कितना है यह तो समालखा के जाटों को जो बरतते होंगे वो बेहतर बता सकते है।

समालखा कस्बा पूरी तरह से जातिवादी कस्बा है ।अपनी मानसिकता और बसावट दोनों में । हर जाति का अपना अलग क्षेत्र है और उनके नाम भी जाति आधारित है ।
#कुहाड़,#बेनीवाल और #कालीरमण ये तीन गौत्र है जाटों के ।जिनमें काली रमण की संख्या सबसे ज्यादा है दूसरे नम्बर पर बेनीवाल है और तीसरे पर कुहाड़।

#कालीरमण में से हमने सुविधा अनुसार काली हटा कर केवल रमन कर लिया । मैं #रमन के बजाय #रमण लिखना पसन्द करता हूँ ।क्योंकि इसका अर्थ मुझे पसन्द है।
खटीक,पंजाबी,चूड़े,चमार,बनिए,ब्राह्मण,लुहार,कुम्हार,नाइ,धोबी, आदि सभी जातियां है ।

मन्दिर खूब सारे है,एक मस्जिद,दो गुरुद्वारे और एक चर्च भी है यहां ।

दिल्ली से चंडीगढ़ जाने वाले मेन रस्ते पर मौजूद होने के कारण आने जाने की खास सुविधा है ।
धन्यवाद

अब इस पर हर रोज लिखूंगा।

बर्तन और पुरुष

सर्दी तो बस रजाई में ही अच्छी लगती है । ठंडे पानी से बर्तन धोने में तो बहुत गन्दी लगती है । इस  चिकनाई ने तो जमा खून पी लिया । एक बर्तन को ही तीन चार बार रगड़ना पड़ता है । कैसा-कैसा अत्याचार हो रहा है मेरी कोमल उँगलियों और हाथों पर।  घास फुस और फल खा कर गुजारा करने वाला वो टैम ही ठीक था ।

ना भाई रसोई में गर्म पाणी कोणी । ईब या सलाह मत दिए अक गैस पे गर्म कर ले । भोत महंगी हो ऋ गैस । और हमारे सिलेंडर की तो आधे से ज्यादा वैसे ही निकल गयी । एक काम और बढ़ गया। हर बार सिलेंडर से खोलो और बन्द करो । किसी दिन भूल उक चूक न हो जाये । राम राम शुभ-शुभ बोलो ।

भैया आप सच में बर्तन भी धोते हो-इनबॉक्स जिज्ञासा

नहीं यार । सच वाले बर्तन हमें कौन धोने देता है । मुझसे झूठे बर्तन धुलवाते है। एकदम ठंडे पानी में वो भी । सॉरी भाई जब आपने मैसेज किया तब बर्तन ही धो रहा था तो आप को जवाब नहीं दे पाया । आप भी सोचते होंगे कि कितना भाव खाता है एक मैसेज का जवाब भी नहीं देता । पर क्या करता भाई गीले हाथों से कैसे जवाब देता।

वो तो अब परात में आट्टा डालते-डालते चैक कर लिया तो आट्टा गूथने से पहले सोचा आपको जवाब दे दूँ । क्या पता आप कब स्क्रीन शॉट काटकर लगा दे कि देखिये इन फेसबुक के क्रांतिकररियों को । फेसबुक पर लिखते है कि ठण्ड में बर्तन धोने में दिक्कत होती है और मैंने एक मासूम सा सवाल पूछ लिया कि क्या आप बर्तन भी धोते हो तो जवाब दिए नहीं बन रहा इनसे ।

अगर आप जवाब से सन्तुष्ट हो तो कृपया शेयर जरूर करें ।

शुक्रिया आपका बहुत बहुत

शब्दकोश

#शब्दकोश

समय और बदलते परिवेश में शब्द अपना अर्थ भी बदलते रहे है । दिक्कत हम जैसों को हो जाती है जो दो समय के बीच के संक्रमण में आगे बढ़ रहे होते है ।

अब BF को ही ले लोजिये । आज की पीढ़ी(जी हम उससे बाहर के ही है) इसका इस्तेमाल बॉयफ्रेंड के लिए करती है ताकि माँ-बाप को या पुराणी पीढ़ी के पल्ले न पड़े। और मॉडर्न भी बने-दिखते रहे। दूसरा तकनीक ने हमें कुछ ज्यादा ही शार्ट कट सीखा दिए है । अब हर जगह शार्ट कट मारने के चक्कर में लाइफ को ही शार्ट करते चले जा रहे है।

और एक हम जैसे है जो BF का मतलब ब्ल्यू फ़िल्म बोलते-समझते है ।जी बिल्कुल जिसे आजकल पोर्न कहा जाता है वो हमारे जमाने की ब्ल्यू फ़िल्में है ।जिन्हें छुपकर देखने के लिए हमने खूब एनर्जी वेस्ट की है ।तब पोर्न देखने का कम पढ़ने का ज्यादा मौका था ।

काश ! किसी ने उस समय ये सलाह दी होती तो हमारा भी भला हो जाता । सलाह ये है कि आप को अंग्रेजी सीखनी है तो अंग्रेजी की पोर्न किताब पढ़िए । जल्दी और रोचक तरीके से सीख जायेंगे ।

जय हो । आप bf लिखते है बॉयफ्रेंड के लिए और मुझे कुछ और समझ आता है ।

किताबें

पुस्तक सूची

अन्धविश्वास उन्मूलन .. दाभोलकर
यादों का गलियारा ... रामशरण जोशी
गंगोत्री से गंगासागर ... निलय उपाध्याय
सत्यजीत राय .... सुशोभित सक्तावत
ममा की डायरी ... अनु सिंह चौधरी
हिंदी का नमक ... कमल जीत चौधरी
हम तुम और वो  ट्रक ... मो यान
गुरु जी की खेती बाड़ी ... विश्वनाथ त्रिपाठी
जिद ... राजेश जोशी
आत्मस्वीकृतियां ... रूसो
एकांत के सौ वर्ष ... मार्केज
लाल सिंह दिल ... प्रतिनिधि कवितायेँ
फांस ... संजीव
दलित साहित्य एक अंतर्यात्रा .. बजरंग बिहारी तिवारी
पांच मिनट और अन्य कहानियां ... योगेन्द्र आहूजा

हम न मरब .... ज्ञान चतुर्वेदी
अपनों में नहीं रह पाने का गीत ... प्रभात
दर्रा दर्रा हिमालय ... अजय सोडानी
गोलवरकरवाद .... शम्सुल इस्लाम
आईना दर आईना ... अशोक कुमार पाण्डेय
सृजन का रसायन ... शिवमूर्ति
मेरा जीवन मेरा समय ... पाब्लो नेरुदा
चॉकलेट फ्रेंड्स .... शिवेंद्र
आमाजगाह .... मनोज रूपड़ा
नाव डूबने से नहीं डरती ... लीना मल्होत्रा राव
डामनिक की वापसी ... विवेक मिश्र

रूसो की आत्मस्वीकृतियां

Ramji भाई, इधर प्रकाशित किताबों की मेरी लिस्ट में अभी तक यह किताबें हैं:

ज़िद / राजेश जोशी / राजकमल
  यायावरी आवारगी / अनुराधा बेनीवाल / राजकमल
नकोहस / पुरुषोत्तम अग्रवाल / राजकमल
  ध्वनियों के आलोक में स्त्री / मृणाल पांडे / राधाकृष्ण
  गोलवरकरवाद: एक अध्ययन / शम्सुल इस्लाम / दखल
  इच्छा नदी के पुल पर / देवयानी भारद्वाज / दखल
  अभिनव सिनेमा / प्रचण्ड प्रवीर / दखल
  जगह / पीयूष दइया / सूर्य प्रकाशन
  अपने दूसरे / अशोक वाजपेयी / सूर्य प्रकाशन
  साझा समय / प्रयाग शुक्ल / सूर्य प्रकाशन
  विदा लेना बाकी रहे / आशुतोष दुबे / सूर्य प्रकाशन
  आमाज़गाह / मनोज रूपड़ा / आधार
  सत्यजीत राय: त्रयी और उत्तरत्रयी / सुशोभित सक्तावत / आधार
  अंतरयात्राएं वाया वियना / ओमा शर्मा / आधार
  जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन / आनन्द तेलतुंबड़े / आधार
  चॉकलेट फ्रेंड्स / शिवेन्द्र / आधार
  विलक्षण यात्री / राजकुमार राकेश / आधार
  मीर की कविता और भारतीय सौन्दर्यबोध / शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी / ज्ञानपीठ 
  इसी दुनिया में / वीरेन डंगवाल / नवारुढ़
  लातिन अमरीका के रिसते जख्म / एदुआर्दो गालेआनो / गार्गी प्रकाशन
  स्त्री उपेक्षिता / सीमोन द बोउवार / हिन्द पॉकेट बुक्स
  विश्व की प्रेम कहानियां / प्रेमचंद गांधी / वाग्देवी प्रकाशन
  कोई लकीर सच नहीं होती / लाल्टू / वाग्देवी प्रकाशन
  तुमि चिर सारथि / तारानंद वियोगी / अंतिका
  सोल्झेनित्सिन / शंकर शरण / यश पब्लिकेशन्स
  असग़र वजाहत की चुनिंदा कहानियाँ / पल्लव / साहित्य भण्डार
  ग़ालिब / पवन वर्मा / ??
  शेख बदरेद्दीन का फतहनामा / नाजिम हिकमत-दिगंबर / संभव प्रकाशन
  विज्ञान का आकाश / संपादक - रमाशंकर / सन शाइन बुक्स, नई दिल्ली
  आइनाख़ाना / कृष्णमोहन / प्रतिश्रुति प्रकाशन

इनके अलावा इन किताबों को मैं पहले ही खरीद/पढ़ चुका हूँ:

बाकरगंज के सैयद / असगर वजाहत / राजपाल
गुरुजी की खेती-बारी / विश्वनाथ त्रिपाठी / राजकमल
जोसेफ एण्टन / सलमान रुश्दी / वाणी प्रकाशन
  आपहुदरी / रमणिका गुप्ता / सामयिक
ज़माने में हम / निर्मला जैन / राजकमल
काले अध्याय / मनोज रूपड़ा , ज्ञानपीठ
अस्सी का काशी / पल्लव / साहित्य भंडार
दंतेवाड़ा यादों का लाल गलियारा / राम शरण जोशी / राजकमल
खाली नाम गुलाब का / अम्बर्तो इको / राजकमल
आखरी मुग़ल / विलियम डैलरिंपल / ब्लूम्सबरी
दोज़ख़नामा / रविशंकर बल / हार्पर हिंदी

कुमारजीव - कुँवर नारायण
इक्कीसवीं सदी में पूँजी - थामस पिकेटी
स्लीपिंग आन जूपिटर - अनुराधा राय
नाइदर हाक नार डव - ख़ुर्शीद महमूद कसूरी
द आइलैंड आफ लॉस्ट गर्ल्स - मंजुला पद्मनाभन
फाँस - संजीव
गीता प्रेस एंड मेकिंग आव हिंदू इंडिया - अक्षय मुकुल
टू इयर्स एट मंथ्स एंड ट्वेटीएट नाइट्स
- सलमान रूश्दी
गो सेट अ वाचमैन - हार्पर ली
थ्री रिवर्स एंड अ ट्री : द स्टोरी आव अलाहाबाद यूनिवर्सिटी - नीलम शरण गौड़
कश्मीर द वाजपायी इयर्स - ए एस दुलत
ड्रोनिंग फ़िश -
स्वाति चंद्रा
पास्ट ऐज प्रजेंट
- रोमिला थापर
ख़ुद पर निगरानी रखने का वक़्त - चंद्रकांत देवताले
पीले रूमालों की रात -
नरेंद्र नांगदेव
जानकीदास तेजपाल मेंसन
- अलका सरावगी

( सभी २०१५ में प्रकाशित )

सूची समृद्ध है। इसमें एक नाम और जोड़ा जाना चाहिए। गणेश देवी की एक महत्वपूर्ण किताब 'विस्मृति के बाद' वाणी प्रकाशन से हिंदी में आयी है। मूल किताब After Amnesia का बढ़िया अनुवाद Awadhesh Tripathi किया है।

ऊपर Manoj जी ने लिस्ट दे ही दी है विश्व साहित्य की। यह कुछ नए व पुराने अनुवाद हैं,जो किसी की लिस्ट में दिखे नहीं,गहन विश्व साहित्य के पाठक देख सकते हैं।

1. वाणी प्रकाशन से मॉगदॉ सॉबो (Magda Szabó) की 'दरवाज़ा' (The door)
2.  राजकमल से दीनो बुत्साती( Dino Buzzati) की तातारी वीरान ( The Tartar Steppe)
3. वाग्देवी प्रकाशन से जोसेफ कॉनराड की ' हार्ट ऑफ़ डार्कनेस' का अनुवाद ' अंधकूप'
4. दस नॉर्वेजी कहानियाँ, अनुवाद- तेजी ग्रोवर ( वाणी प्रकाशन)
5. पान, नत हैमसुन,अनुवाद - तेजी ग्रोवर ( वाणी प्रकाशन)
6. भूख, नत हैमसुन, अनुवाद - तेजी ग्रोवर ( वाणी प्रकाशन)
7. कुक्कुर नक्षत्र, Agneta Pleijel,अनुवाद - अखिलेश ( वाणी प्रकाशन)
8. Aliss at the fire,Jon Fosse (तेजी ग्रोवर जी का शीघ्र प्रकाशय अनुवाद)

शनिवार, 2 जनवरी 2016

फ़िल्में

फ़िल्में

दसविदानिया
आँखों देखी
चॉकलेट

Amelie, All about my mother, नसीम, स्पर्श, children of heaven, city of gods, lunchbox, kiss of the spiderwoman, Calcutta Trilogy by Satyajeet Ray, Pather Panchali, Ajantrik, Modern Times, The Great Dictator, शतरंज के खिलाड़ी, To kill a mocking bird, Irma la douche, The Apartment, the graduate, You've got mail,

Notebook,blood diamond,the black world,12 year a slave,अंग्रेज,मिट्टी,gravity,the great dictator

अंगूर, चुपके-चुपके, Fire, life is beautiful, Schindlers list, Malena, Color of paradise, Children of heaven, Bandit Queen, Before the rains

सलाम बॉम्बे, उड़ान, फैंड्री, इकबाल, वेलकम टू सज्जनपुर, अंदाज़ अपना अपना, धोबी घाट, जाने भी दो यारों, हेरा फेरी, कोर्ट,

थैंक्स माँ.. हिला न दे आपको तो कहना

गट्टू
चिल्लर पार्टी
उड़ान
तहान
सिकंदर
फ़िराक़
रामचंद पाकिस्तानी
मत्रिभुमि
तमस
भारत एक खोज
यात्रा
15 पार्क एवेन्यू
दो बीघा जमीन
आमिर
मुखबिर
हजारों ख्वाहिशे ऐसी
ट्रैफिक सिग्नल
ट्रेन टू पाकिस्तान
गांधी
धर्म
ब्लैक एंड वाइट
काबुल एक्सप्रेस
पैरो तल्ले
व्हेन हरी गोट मैरिड
शाहिद
गांधी माय फादर
मैंने गांधी को नही मारा
बिन रोय
खुदा क़े लिए
बोल
दसविदानिया
भेजा फ्राई
खोसला का घोसला
शंघाई
गुलाल
पेज थ्री
परजानिया
लम्हा
फैशन
जेल
चांदनी बार
प्रोवोक्ड
जूनून
जॉगर्स पार्क
वॉटर
फायर
अर्थ 1947
धोबी घाट
आस्था
मॉनसून वेडिंग
तेरे संग
स्ट्राइकर
इश्किया
पा
चीनी कम
मकबूल
इक़बाल
एल एस डी
लाहौर
सहर
वेक अप सिड
पार्टीशन
होली
हासिल
यहाँ
दिल दोस्ती एक्स्ट्रा
जागो
अनवर
नो स्मोकिंग
खोया खोया चाँद
जख्म
चक दे इंडिया
थ्री इडियट
ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा
दो दुनी चार
अंतर्द्वंद
दांये या बांये
एक डॉ की मौत
निशांत
भूमिका
अंकुर
गिद्ध
द्रोहकाल
देहम्
इडियट
सलीम लंगड़े पे मत रो
जाने भी दो यारो
मढ़ी का दीवा
मम्मो
नसीम
पार्टी
संशोधन
वेलकम टू सज्जनपुर
वेल डन अब्बा
प्रतिघात
अंकुश
तारे ज़मीन पर
लिटल टेररिस्ट
हार्वेस्ट ऑफ़ हंगर
वार एंड पीस
इन दी नेम ऑफ़ गॉड
पानी पे लिखा
फाइनल सोल्यूसन
मजमा
पिता पुत्र एवम् धर्मयुद्ध
...............
.............
अंकुर अरोड़ा मर्डर

The shawsank redemption,changeling,life is beautiful,now you see me,the prestige,shutter island,the curious case of Benjamin button,usual suspect,the departed,12 angry men ,the bucket list,the village.

बिन रोये
पाकिस्तानी फ़िल्म है

Talking Pelham 123

Have you seen in hindi Guide , Mera Naam Joker , Do Aankhen Baarah Haath . In English Godfather , Cleopatra , Benhur , Far from Medding Crowd a few to watch for a big canvas movies

Let me list ones which aren't listed till now. Quilla (Marathi), I, the worst of all, freedom writers, the innocent, the last monarch, the bridge over the river Kwai, Bol, Lola runnett, entire Kurosawa set!

Mr.& mrs Iyyer,
हज़ार चौरासी की माँ,
साज, अर्थ,
खुदा के लिए,
शाहिद
पार्टी Life is beautiful,
Notting Hill
Schindlers list

3 iron
Dreams
Pieta
old boy
Sleep tight
Open your eyes
Inherit the wind
Cinema Paradiso
Il postino
lovers of arctic circle
Xxy
Samsara (pan nalin's)
The skin i live in.
Atonement

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

पॉपुलर कल्चर को समझने का नया नज़रिया

पॉपुलर कल्चर को समझने का नया नज़रिया

जगदीश्वर चतुर्वेदी

 

हमारे समाज में जिस तरह पापुलर कल्चर के प्रति अनालोचनात्मक प्रचार चल रहा है और प्रगतिशीलों के द्वारा जिस तरह पापुलर कल्चर की उपेक्षा की जा रही है वह चिन्ता की चीज है। पापुलर कल्चर को लेकर प्रगतिशीलों में दो तरह का नजरिया रहा है,पहला नजरिया यह मानकर चलता है कि पापुलर कल्चर के अंदर जाकर काम करो,उसके विधा और मीडिया रुपों का इस्तेमाल करो और समाज में अच्छे विचारों और मूल्यों का प्रचार करो। यानी पापुलर कल्चर को प्रचार से ज्यादा वे महत्व नहीं देते।


 

दूसरा नजरिया पापुलर कल्चर को आए दिन धिक्कारता रहता है। धिक्कार और पूजा के परे जाकर आलोचनात्मक नजरिए से पापुलर कल्चर के तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ विचार किया जाना चाहिए। बोर्द्रिओ का मानना है कि सांस्कृतिक अभ्यासों और सांस्कृतिक परंपरा के ज्ञान का गहरा संबंध शिक्षा और सांस्कृतिक अभिरुचि के स्तर के साथ है। इसमें शिक्षा की निर्णायक भूमिका है। शिक्षा के द्वारा ही सांस्कृतिक अभ्यास और आदतें निर्मित की जाती हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक आकांक्षाएं और इच्छाएं भी शिक्षा के कारण पैदा होती हैं। किसी व्यक्ति में किस तरह की सांस्कृतिक इच्छा और आकांक्षाएं हैं ,यह इस बात से तय होगा कि उसकी किस तरह की शिक्षा हुई है और किस तरह के सांस्कृतिक अभ्यासों से गुजरा है। संस्कृति लोगों को प्रेरणा प्रदान करे इसके लिए जरुरी है कि उन्हें शिक्षा प्रदान की जाय। इसके अलावा दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है परिवार। व्यक्ति किस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता है और परिवार उसके अंदर किस तरह का सांस्कृतिकबोध निर्मित करता है।


 

संस्कृति के निर्माण में शिक्षा के बाद दूसरा सबसे बड़ा संस्थान है परिवार। शिक्षा और परिवार ये दो तत्व ऐसे हैं जो व्यक्ति के लिए सांस्कृतिक संपदा पैदा करते हैं। मसलन् एक व्यक्ति है जो बेहतरीन सांस्कृतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता है,बेहतर शिक्षा पाता है,दूसरा व्यक्ति भी उसी आर्थिक स्तर के परिवार से आया है और समान रुप से बेहतर शिक्षा पाता है,किंतु उसके पास पारिवारिक-सांस्कृतिक संपदा नहीं है ,ऐसे में दोनों का सांस्कृतिकबोध एक ही स्तर का नहीं होगा। क्योंकि पहले वाले व्यक्ति के पास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है जबकि दूसरे के पास इसका अभाव है। परिवार की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति के सांस्कृतिक परिवेश के निर्माण में गहरी भूमिका होती है। मजदूरवर्ग के परिवारों से आने वाले लोगों के पास किसी भी किस्म की सांस्कृतिक संपदा( कल्चर कैपीटल) नहीं होती। यही वजह है कि वे अपने बच्चों को किसी भी किस्म की संस्कृति नहीं सौंपते। वे किसी भी किस्म की वैध सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय नहीं होते। वे वैध सांस्कृतिक रुपों को भी समझने या उनक प्रशंसा करने में असमर्थ होते हैं। वे सांस्कृतिक तौर पर धमकाए जाते हैं अथवा अपमानित किए जाते हैं। अथवा वे संस्कृति के प्रति उदासीन रहते हैं।


 

संस्कृति के सम्मुखीन होने का अर्थ है अपनी चेतना के सम्मुखीन होना। यही वजह है कि मजदूरवर्ग के लोग संस्कृति से वंचित ही नहीं होते बल्कि वे जानते ही नहीं हैं कि वे वंचित हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मजदूरवर्ग के लोग संस्कृति की आकांक्षा तक से वंचित होते हैं। वे उसका मूल्य नहीं समझते, इस चीज को पहचान नहीं पाते कि उनका प्रेरक मूल्य कौन सा है। यही वह बुनियादी बिंदु है जिसके आधार पर पियरे बोर्दिओ ने '' सांस्कृतिक आवश्यकता'' (कल्चरल नीड्स)की धारणा पर जमकर हमला किया है। बोर्दिओ का मानना है कि ''सांस्कृतिक आवश्यकता'' हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था पैदा करती है। इसी बुनियादी तत्व को केन्द्र में रखकर बोर्द्रिओ ने कहा है कि स्कूली शिक्षा व्यवस्था मजदूरवर्ग के हितों के खिलाफ काम कर रही है। स्कूली व्यवस्था हमारे समाज में व्याप्त असमानता को रेखांकित करने,उसे दूर करने में असमर्थ रही है। सामाजिक असमानता के जनतांत्रिक रेहटोरिक का हमने प्रचार ज्यादा किया है किंतु हमारी स्कूली व्यवस्था मूलत: मजदूरवर्ग विरोधी रही है। यही बात भारत के संदर्भ में भी लागू होती है। हमने अपनी स्कूली शिक्षा प्रणाली में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति का जितना प्रचार किया है और उसका कोर्स बनाया है,बुनियादी तौर पर यह सारा प्रयास मजदूरवर्ग विरोधी है। मजदूरवर्ग के नजरिए से हमने स्कूल व्यवस्था को कभी देखने का प्रयास ही नहीं किया। जब एक बार हमने स्कूल व्यवस्था को सामाजिक असमानता के सामने बलि चढ़ा दिया तब बाकी सांस्कृतिक वैषम्य को दूर करना संभव ही नहीं होगा। ऐसे में संस्कृति को लेकर कमजोर समझ और सही समझ का भेद बना रहेगा।


 

सामाजिक सांस्कृतिक वैषम्य को दूर करने के पहले जरुरी है कि स्कूली शिक्षा को दुरुस्त किया जाय। उसे मजदूरवर्ग के नजरिए के अनुरुप तैयार किया जाय। तब ही सांस्कृतिक अंतरों को चुनौती दी जा सकती है,सांस्कृतिक बढ़त और पिछडेपन को समझा जा सकता है,उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। जो लोग पापुलर कल्चर के पक्ष में विभिन्न माध्यमों में आए दिन चालाकी और दिशाहीन ढ़ंग से हिमायत करते रहते हैं, वे ''संस्कृति पाने के लोकतांत्रिक अधिकार' से वंचित करने की प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हैं। पापुलर कल्चर के पक्षधर यह तर्क देते हैं कि 'वे संस्कृति का जनतांत्रिकीकरण' कर रहे हैं। इस तर्क की बोर्द्रिओ ने तीखी आलोचना की है। बोर्द्रिओ ने सवाल किया है कि हमें सांस्कृतिक अभ्यासों की वैज्ञानिक अवधारणा का निर्माण करना चाहिए। जिससे उन परिस्थितियों को जान सकें कि आखिरकार किन परिस्थितियों में संस्कृति निर्मित होती है। इसके आधार पर ही संस्कृति के लोकतांत्रिकीकरण की यथार्थवादी और प्रभावशाली नीति निर्मित की जा सकती है। हमारे ज्यादातर संस्थानों की नीतियां मजदूरवर्ग विरोधी रही हैं। वे मजदूरवर्ग पर हमले करती रही हैं। हमारी कलादीर्घाओं, संग्रहालयों, सांस्कृतिक केन्द्रों में किस तरह के लोग आते हैं,ये वे लोग है जो पहले से ही सांस्कृतिक समर्थ हैं,ये मध्यवर्ग के लोग हैं। ये वे लोग हैं जो हमारी स्कूली व्यवस्था से आ रहे हैं,ये वे लोग हैं जो अलग से किसी खास सांस्कृतिक शिक्षा में तपकर नहीं आए हैं बल्कि सामान्य स्कूली शिक्षा ने ही इनके अंदर सांस्कृतिकबोध पैदा किया है। इसका अर्थ यह है कि स्कूली शिक्षा दीर्घकालिक सांस्कृतिकबोध निर्मित करती है। इससे एक बात सिध्द होती है कि स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गतिविधियां हाशिए की गतिविधि नहीं है बल्कि केन्द्रीय गतिविधि है।
बोर्द्रिओ ने संस्कृति हासिल करने की प्रक्रिया के लोकतांत्रिकीकरण के सवालों ,आदर्श संस्कृति के सवालों आदि को उठाया है। यह वह संस्कृति है जो लोगों को आकर्षित करती रहती है। शिक्षा और राज्य के संस्थान संस्कृति के कल्ट को पैदा करने के केन्द्र बनकर रह गए हैं। ये उन्हीं लोगों को तैयार करते हैं जो संस्कृति में डूबे हुए हैं। संस्कृति के प्रति आस्थावान हैं। किंतु जिन लोगों के पास अब तक शिक्षा नहीं पहुँच पायी है और जिन्हें अब तक संस्कृति से वंचित रखा गया उन्हें कैसे शिक्षा और संस्कृति के करीब लाया जाय,इस ओर हमने अभी तक कोई प्रयास नहीं किया। किसी व्यक्ति को शिक्षित करने अर्थ यह नहीं है कि वह सांस्कृतिक तौर पर समर्थ बन गया है। शिक्षा स्वयं में सांस्कृतिक मूल्य पैदा नहीं करती। इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि व्यक्ति शिक्षा में सफल रहा है।
वे ही लोग शिक्षा की सीमाओं का अतिक्रमण कर पाते हैं जो अकादमिक संस्कृति को आत्मसात् कर लेते हैं,जो अकादमिक संस्कृति के मुक्तिकामी संस्कारों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था में यही वह तत्व है जो गहराई में जाकर प्रभुत्वशाली वर्ग के मूल्यों को सहज ही आत्मसात करने के लिए तैयार करता है। आज अकादमिक जगत में अकादमिक अभ्यास और अकादमिक प्रतिवाद के बीच विवाद फैशन के रुप में दिखाई देता है। दूसरी ओर प्रामाणिक संस्कृति है जिसने अपने को स्कूल विमर्श से मुक्त कर लिया है। इसकी चंद सांस्कृतिक लोगों के लिए ही प्रासंगिकता रह गयी है। क्योंकि अकादमिक संस्कृति पर पूर्ण अधिकार ही स्कूल संस्कृति के परे जाने और पूरी तरह मुक्त संस्कृति को पाने की शर्त है।इसका अर्थ है कि संस्कृति को अकादमिक क्षेत्र के बाहर फेंक दिया गया है जबकि पहले संस्कृति को बुर्जुआजी और शिक्षा जगत सबसे ज्यादा मूल्यवान मानता था,उसे सम्मान देता था।
प्रामाणिक संस्कृति वह है जिसे हम संस्कृति का मुक्त क्षेत्र कहते हैं। जो स्कूल व्यवस्था में भी है और उसके परे भी जाती है। मसलन् ज्यों ही कोई नया सांस्कृतिक माल बाजार में आता है तो बुर्जुआजी उसे आत्मसात करने के लिए कहता है। यह वह माल है जो स्कूल व्यवस्था के बाहर है। मसलन् जॉज या सिनेमा है,ये शिक्षा के बाहर है और वैध सांस्कृतिक माल भी हैं। यह एक तरह की सांस्कृतिक वैधता भी प्रदान करता है। इन्हें वे लोग आत्मसात करते हैं जो वैध संस्कृति को आत्मसात करने की स्थिति में होते हैं। बोर्द्रिओ का मानना है कि सांस्कृतिक विषयों की प्रस्तुति और समाधान मूलत: व्यक्ति के निजी एटीट्यूट पर निर्भर करती है। इसे '' सांस्कृतिक अभ्यासों की चमत्कारिक विचारधारा'' की सैध्दान्तिकी के आधार पर ही हल किया जाता है। अभिजन का संस्कृति के साथ जिस तरह का रिश्ता होता है वही व्यवहार में फ्रांस में वर्चस्व बनाए हुए है। अभिजन का संस्कृति के प्रति नजरिया स्वाभाविक, अनारोपित, सांस्कृतिक रुपों का सहजजात प्रशंसक का दिखाई देता है। बोर्द्रिओ का मानना है कि अभिजन का नजरिया जिस तरह स्वाभाविक और सहजजात प्रशंसक का नजर आता है,वह वस्तुत: उसकी विशिष्ट सामाजिक अवस्था के कारण है। उच्चवर्गीय पारिवारिक जीवनशैली के कारण श्रेष्ठ संस्कृति को वह सहज ही आत्मसात कर लेता है। संस्कृति की अभिजन इसलिए प्रशंसा नहीं करता कि वह उसके लिए स्वाभाविक है,समझ में आती है। बल्कि उसका संस्कृति के साथ लंबा आंतरिक परिचय रहा है।


 

कलादीर्घाएं एक तरह से धार्मिक मंदिर के रुप में देखी जाती हैं। इनमें साइलेंस या चुप्पी को काफी महत्व दिया जाता है। वस्तुओं को स्पर्श न करने की हिदायत रहती है। ये परंपरागत कलादीर्घाएं संस्कृति की अभिजनवादी समझ को अभिव्यंजित करती हैं। अभिजन के अनुसार सौन्दर्यबोधीय अनुभव रहस्योद्धाटन के करीब होता है।इसे सच्ची प्रशंसा और समझ के आधार पर चंद लोग ही पा सकते हैं। संस्कृति को पाने वाले चंद अभिजन ही हो सकते हैं। बाकी सब इसके भक्त अथवा संस्कृतिधर्म के भक्त हो सकते हैं। सभी इस पवित्र संस्कृति के स्पर्श से रुपान्तरित कर सकते हैं,मुक्त कर सकते हैं।सभी राज्य के द्वारा चलायी जा रही सांस्कृतिक मुक्ति का आशीर्वाद पा सकते हैं।
इसके विपरीत बोर्द्रिओ ने नयी लोकतांत्रिक मुक्त कलादीर्घाओं की परिकल्पना पेश की। ये कलादीर्घाएं ज्यादा खुली ,स्वागत करने वाली और सहिष्णु हैं। साथ ही ये कला की शिक्षा देती हैं ,समझ बनाती हैं, और प्रशंसाभाव पैदा करने वाली हैं। क्योंकि परंपरागत कला दीर्घाएं सिध्दान्तत: कला की शिक्षा और समझ प्रदान नहीं करतीं।बल्कि ऐसा करने से इंकार करती हैं।